बाप लड़ा था वालिद से।
पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।
पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।
पहुँची थी अपने उरूज पर कर्बला में दुश्मनी,
जो शुरू हुई मक्का में रसूलुल्लाह की विलादत से।
गर तलाश हो हक़ की, तो सच को समझना पड़ेगा,
तारीख़ को सिर्फ़ जंग नहीं, इंसाफ़ से पढ़ना पड़ेगा।
मजबूरी थी फ़त्ह-ए-मक्का,
न करते क़ुबूल दावत, तो क्या करते?
आ गए साये में इस्लाम के,पढ़ा कलिमा डरते-डरते।
वक़्त-ब-वक़्त साया-ए-तकरार बढ़ता गया,
नस्ल-दर-नस्ल ईमान का पैमाना घटता गया।
आते-आते तीसरी नस्ल, ख़ून तक़रीबन काफ़िर हो गया।
शाम के बादशाह का बेटा, क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।
क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।
जो मिटाने चले थे अहल-ए-बैत को,
अपनी नस्ल पर दाग़ लगा बैठे।
कर्बला में लगाई आग,
और ख़ानदान अपना जला बैठे।
वो मर के मलऊन हो गया, मुआविया का लख़्त-ए-जिगर।
अली के चिराग़ आज भी रोशन हैं, आँधियों से बेफ़िक्र।
तन से जुदा होकर भी रहा बुलंद, नेज़ों पर सर जिसका।
वो हुसैन हैं।
वो कभी हारे नहीं,
कर्बला में बस जीते ही हुसैन हैं।
हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।
हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।
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