Showing posts with label Article Hindi. Show all posts
Showing posts with label Article Hindi. Show all posts

सोशल मीडिया की तेज़ी से बढ़ती दुनिया में — जहाँ रील्स, शॉर्ट्स और वायरल क्लिप्स हमारी स्क्रीन पर छाए रहते हैं — एक चुपचाप लेकिन बेहद चिंताजनक समस्या हमारे समाज में जड़ें जमा रही है। यह हमारे घरों में मौज-मस्ती और मासूमियत के नक़ाब में धीरे-धीरे प्रवेश कर चुकी है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम एक पूरी पीढ़ी के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।

यह कोई साधारण बात नहीं है — यह बच्चों के शोषण और दुरुपयोग का एक नया रूप है, जो कि किसी भी सरकार, संस्था या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म द्वारा न तो पहचाना गया है, न ही नियंत्रित किया गया है, मुझे ऐसा लगता है, इस क्षेत्र मे अभी तक नाक़ाफी काम ही हुआ है।

🎥 क्या हो रहा है?
आज लाखों परिवार और कंटेंट क्रिएटर अपने ही बच्चों का उपयोग शर्मनाक रूप से लाइक, शेयर, कमेंट और वायरल होने के लिए कर रहे हैं। शायद यह उस ख़तरनाक सोच का नतीजा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे समाज मे अपनी जड़ें बहुत मज़बूत कर चूका है, एक ऐसी मानसिकता जो शायद आज भी नहीं बदली है, और पेरेंट्स सोचते है कि बच्चे हमारी “मालिकियत” होते हैं — और माता-पिता को पूरा हक़ है कि वे अपने बच्चों को किसी भी समय, किसी भी उद्देश्य से, किसी भी प्रकार की सामग्री में शामिल कर सकते हैं। सोशल मीडिया के दौर मे बड़ी नकटाई, बड़ी बेशर्मी के साथ छोटे बच्चों की मासूमियत का इस्तेमाल क्या जा रहा है।

🚨 हमारे समाज की एक नई शर्मनाक सच्चाई

यह बच्चों के शोषण का सबसे बड़ा, सबसे नया और सबसे ख़तरनाक रूप बन चुका है — और यह सब परिवारों के भीतर हो रहा है, बाहरी लोगों द्वारा नहीं।

सोशल मीडिया कंटेंट बनाना आसान काम नहीं है। बच्चों से बार-बार रील शूट करवाई जाती है, दबाव में प्रदर्शन करवाया जाता है, और कई बार उन्हें रात तक काम करना पड़ता है। चाहे बच्चा थका हुआ हो, परेशान हो या कुछ करने का मन न हो — अगर रील बनानी है, तो प्रदर्शन करना ही पड़ेगा, बेहिस बन कर माँ — बाप, भाई बहन घर के छोटे बच्चों को अपने कंटेंट के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

यह हमारे समाज की शर्मनाक हकीकत है:
बच्चों की मासूमियत और क्यूटनेस को “वायरल पहुंच” के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इन बच्चों को एक्टिंग, डांस, रोना, हँसना, और कैमरे के सामने “क्यूट” दिखने के लिए मजबूर किया जाता है — सब कुछ सिर्फ व्यूज़, लाइक्स और पैसे के लिए, कुछ लोग सोशल मीडिया के दौर मे इस क़दर घटियापन तक पहुंच गए हैं की अपने बच्चों की घरेलु ज़िंदगी भी रील्स और शार्ट मे शेयर करते है, सिर्फ इस लालच से की शायद यह वायरल हो जाए और उनकी कमाई का एक रास्ता और खुल जाये।

कुछ बच्चे शायद इसका आनंद लेते दिखते हैं, लेकिन कई बार बच्चों पर ज़बरदस्ती की जाती है। पर्दे के पीछे तनाव, बार-बार टेक, लालच, भावनात्मक दबाव और कई बार डाँट-फटकार भी शामिल होती है, हम सब को सिर्फ वो नज़र आता है जो स्क्रीन पर है, स्क्रीन की चमक हमारी आखों पर एक ऐसी पट्टी बांध देती है की उसके पीछे ज़ुल्म और शोषण की जो गन्दगी है, वो हमें दिखाई ही नहीं देती।

साफ़-साफ़ कहें — यह बच्चों का शोषण है। और यह सब दिन के उजाले में हो रहा है।

🧠 मानसिक प्रभाव

प्राइवेसी का नुकसान: बच्चे अपनी निजी सीमाओं के बिना बड़े हो रहे हैं। उनके सबसे निजी क्षण लाखों लोगों के सामने होते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर: लगातार प्रदर्शन का दबाव, आलोचना और ध्यान की ज़रूरत से बच्चे चिंता, पहचान संकट या डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं, छोटी सी उम्र मे कुछ बच्चे हिन् भावना का शिकार हो सकते है तो कुछ अपने आप को बहुत अलग होने की भावना से ग्रसित हो सकते है, इस तरह के हजारों दबाव में उनकी परवरिश उनकी मानसिकता को कैसे डेवलप करेगी हमें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है।

डिजिटल छवि का खतरा: आज बनाए गए वीडियो बच्चे की पूरी जिंदगी पीछा कर सकते हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया जितना सुखद दिखता है, उससे कई ज़ियादा दुःख यह ज़िन्दगी मे दे सकता है, कमान से छूटा हुआ तीर, बंदूक से निकली गोली और इंसान के अल्फ़ाज़ जिस तरह एक बार निकलने के बाद रिवर्स नहीं होते उसी तरह इंटरनेट सोशल मीडिया पर डाली हुई चीज़ रिवर्स नहीं की जा सकती, उन्हें कोई नियंत्रण नहीं है, फिर भी उनका चेहरा और पहचान इंटरनेट पर हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है।

💰 पैसे का क्या? असली फ़ायदा किसे हो रहा है?

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस मासूमियत के पीछे छुपा हुआ आर्थिक शोषण।

लाखों परिवार और कंटेंट क्रिएटर ऐसे वीडियो के ज़रिए अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं जो सिर्फ़ बच्चों की वजह से वायरल हो जाते हैं। प्रायोजित कंटेंट से लेकर ब्रांड डील और YouTube से कमाई तक — बच्चों पर केंद्रित कंटेंट पैसे कमाने का एक बड़ा ज़रिया है।

बच्चों की परवरिश, उनकी ज़रूरते पूरी करना माँ बाप की ज़िम्मेदारी होती है, लेकिन यह बेहद अफ़सोस की बात है, बहुत घिनौनी हरकत है की कंटेंट मे बच्चों का इस्तेमाल हो रहा है और लाखों बच्चे माँ बाप को पाल रहे हैं, बच्चे माँ बाप की कमाई का ज़रिया बने हुए है।

लेकिन समस्या यह है:

सारी कमाई माता-पिता या कंटेंट क्रिएटर के अकाउंट में जाती है।

कोई कानून नहीं है जो तय करे कि बच्चे को उसका हिस्सा मिले

ज़्यादातर बच्चों को यह भी नहीं पता कि उन्हें “कमाई” का ज़रिया बनाया गया है

फिल्म इंडस्ट्री में बच्चों के लिए ट्रस्ट फंड और कार्य घंटों की सीमा होती है — लेकिन सोशल मीडिया में सब कुछ बेलगाम है

अगर यह बिना रोक-टोक जारी रहा, तो हम न केवल भावनात्मक नुकसान देखेंगे — बल्कि एक लाइव आर्थिक शोषण भी।

⚖️ कानून कहाँ हैं?

जब कि पारंपरिक फिल्म और टेलीविजन उद्योगों में बाल कलाकारों के उपयोग के लिए सख्त नियम हैं — जिसमें काम के घंटे, वेतन और मनोवैज्ञानिक देखभाल शामिल हैं — सोशल मीडिया सामग्री के लिए ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है।

  • फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में बच्चों के लिए सख्त नियम हैं — लेकिन सोशल मीडिया में कुछ भी नहीं
  • इस बात पर कोई कानूनी सीमा नहीं है कि कोई बालक या बालिका कितनी बार रीलों में दिखाई दे सकते है।
  • बच्चे से किसी सहमति प्रोटोकॉल की आवश्यकता नहीं है।
  • कोई सरकारी निगरानी नहीं,कोई भी प्राधिकरण या एजेंसी ऐसे उपयोग की निगरानी या लाइसेंस नहीं देती है।
  • कोई आय-संरक्षण व्यवस्था नहीं

यह एक कानूनी शून्य है — जो बच्चों को नुकसान पहुँचा रहा है,यह खामी बच्चों को ऑनलाइन अप्रतिबंधित और संभावित रूप से हानिकारक उपयोग की अनुमति देती है।

🚨 यह इतना जरूरी क्यों है?

आज लाखों रुपये बच्चों की वजह से वायरल कंटेंट से कमाए जा रहे हैं — लेकिन:

कई परिवार और कंटेंट क्रिएटर वायरल कंटेंट से लाखों की कमाई कर रहे हैं, जो उनमें शामिल बच्चों की वजह से लोकप्रिय हो जाता है।

फिर भी, इस पैसे को बच्चे के साथ साझा करने या उनके भविष्य के लिए सुरक्षित करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

ज़्यादातर मामलों में, पूरी आय माता-पिता या क्रिएटर के खाते में जाती है, और इसमें कोई पारदर्शिता या सुरक्षा उपाय नहीं होते।

डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में इन बच्चों को किसी भी मौजूदा बाल श्रम या आय कानून द्वारा संरक्षित नहीं किया जाता है।

उनके श्रम, भावनाओं, छवि और पहचान का मुद्रीकरण किया जा रहा है — लेकिन उनके अधिकारों को मान्यता नहीं दी जा रही है।

फिल्मांकन के घंटों की कोई सीमा नहीं है, सहमति की कोई जाँच नहीं है, और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है।

बच्चों की मेहनत, भावनाएँ और पहचान — सबका दोहन हो रहा है। लेकिन उनके अधिकारों की कोई बात नहीं कर रहा।

🛑 अब क्या बदलाव जरूरी हैं?

मैं सरकारों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और बाल अधिकार संगठनों से निवेदन करता हूँ:

हमारी सरकारों और प्लेटफ़ॉर्म्स को क्यों कार्रवाई करनी चाहिए
हालांकि कई देशों में बाल श्रम से जुड़े सख्त कानून हैं, लेकिन डिजिटल क्षेत्र अभी भी काफी हद तक अनियमित है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म नैतिकता से ज़्यादा जुड़ाव को प्राथमिकता देते हैं। सरकारों ने शायद अभी तक इस आधुनिक शोषण से निपटने के लिए कोई स्पष्ट नीतियाँ नहीं बनाई हैं।

✅ प्रमुख सिफारिशें:

  • न्यूनतम आयु सीमा: 13 या 14 साल से कम उम्र के बच्चों को बिना कानूनी अनुमति के मोनेटाइज्ड कंटेंट में न शामिल किया जाए
  • अनिवार्य अनुमति प्रणाली: कंटेंट क्रिएटर्स को बाल कलाकार कानूनों जैसे परमिट लेने अनिवार्य हों
  • कमाई का ट्रस्ट फंड: बच्चे के भविष्य के लिए आय का एक निश्चित प्रतिशत ट्रस्ट खाते में जमा करना अनिवार्य हों। बच्चों की आय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी वित्तीय सुरक्षा उपाय
  • डिजिटल निगरानी प्राधिकरण: एक डिजिटल बाल सुरक्षा संस्था बनाई जाए जो ऑनलाइन बाल शोषण से संबंधित शिकायतों की समीक्षा, विनियमन और कार्रवाई कर सके।
  • अभिभावक के लिए जागरूकता अभियान: बच्चों की सहमति, अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य पर शिक्षा दी जाए
  • सख्त दंड: बच्चों के शोषण पर भारी जुर्माना और सोशल मीडिया प्रतिबंध लगाए जाएँ

📣 भविष्य के लिए चेतावनी

अगर इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह प्रवृत्ति अगले 10 से 15 सालों में लाखों बच्चों की ज़िंदगी को चुपचाप बर्बाद कर सकती है। और इंटरनेट — हमारी यादों के उलट — कभी नहीं भूलता।

इंटरनेट कभी नहीं भूलता। आज जो “मासूम मज़ा” लगता है, वही बड़े होने पर उन बच्चों के लिए गहरी शर्म, उलझन या आघात का कारण बन सकता है। हम नहीं जानते कि एक बच्चा — किशोर या वयस्क होने पर — कैसा महसूस करेगा या करेगी, जब वह उन रीलों या शॉर्ट्स को देखे जिनमें उसे कैमरे के सामने अभिनय, नृत्य या प्रदर्शन करने के लिए मजबूर किया गया था। या फिर वायरल के लालच मे उस बच्चे से ऐसी हरकते करवाई गई जो आज शायद उसके लिए शर्मिंदगी की बात हो,
कुछ के लिए, यह हानिरहित हो सकता है। दूसरों के लिए, यह अवसाद, आक्रोश या पहचान की खंडित भावना को जन्म दे सकता है।

बच्चों को नहीं पता कि भविष्य में जब वे बड़े होंगे, तब इन रील्स को देखकर वे कैसा महसूस करेंगे। शायद कुछ को कोई फर्क न पड़े — लेकिन बहुतों को यह एहसास हो सकता है कि उनके माता-पिता ने उनके बचपन का इस्तेमाल पैसा कमाने और लाइक्स बटोरने के लिए किया।

कल्पना कीजिए कि आप बड़े हो रहे हैं और आपको एहसास हो रहा है कि आपके अपने माता-पिता ने आपके बचपन का इस्तेमाल — आपके चेहरे, आपकी आवाज़, आपकी भावनाओं का — लाइक्स, ध्यान और पैसा कमाने के लिए एक साधन के रूप में किया। यह एहसास क्रोध, अविश्वास या स्थायी मनोवैज्ञानिक घाव पैदा कर सकता है।

यह सिर्फ पालन-पोषण की गलती नहीं — यह एक गहराता हुआ सामाजिक और कानूनी संकट है।

हम अभी शुरुआती संकेत देख रहे हैं। लेकिन अगर हम चुप रहे, तो हम एक ऐसी पीढ़ी को जन्म देने का जोखिम उठा रहे हैं जो ख़ुद को इस्तेमाल किया हुआ, अनदेखा और भावनात्मक रूप से परित्यक्त महसूस करेगी — और यह सब वायरल क्लिप्स के लिए।

शायद आज भी चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं। शायद आज हम सुरक्षा-व्यवस्था बना सकें। लेकिन कल बहुत देर हो सकती है।
मैं किसी को डराने या नाटकीय होने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ — मैं ईमानदार होने की कोशिश कर रहा हूँ। अगर हम अभी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो मुझे लगता है कि निकट भविष्य में इस अनियंत्रित डिजिटल वातावरण में पले-बढ़े युवाओं में सामाजिक अलगाव, चिंता, अवसाद और यहाँ तक कि आत्म-क्षति भी बढ़ेगी। और कही न कही इसके ज़िम्मेदार हम सब लोग है जो की आज चुप हैं और बल्कि चुप ही नहीं है मज़े के साथ इस शोषण का आनंद ले रहे है।

✊ अब रुकने का नहीं, बोलने का समय है

आइए हम सब मिलकर एक सुरक्षित भविष्य बनाएँ। आइए बचपन की रक्षा करें — ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों जगह।

बचपन बिकाऊ नहीं है। बच्चे केवल कंटेंट नहीं हैं।

✍️ कार्रवाई करें: बच्चों की सुरक्षा के लिए पेटीशन पर साइन करें

अगर आप इस मुद्दे से चिंतित हैं — एक माता-पिता, शिक्षक, नीति निर्माता या एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में — तो कृपया आवाज़ उठाइए।

👇 अभी इस पेटीशन पर साइन कीजिए:

👉 इस लिंक पर क्लिक करें और साइन करें

https://chng.it/pZGkMhJQdb

सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए
@zakiashkim

 

 

सोशल मीडिया हमारी नई दुनिया
सोशल मीडिया कोई सोशल नेटवर्किंग प्लॅटफॉम्स नहीं है, सोशल मीडिया अपने आप मे एक दुनिया है, एक ऐसी दुनिया जो आप की हमारी एक ऊँगली के इशारे से कुछ एक इंच की स्क्रीन पर चलती है, यह सोशल मीडिया की दुनिया कभी कभी तो लगता है की हमारी हक़ीक़ी दुनिया से बेहतर है, यहा आइडियल, मोटिवेट, और नसीहत भरी पोस्ट्स की भरमार होती है, एक से बढ़ कर एक नसीहत भरी कहानिया और मिसालें उस पर कमाल यह है की यहाँ कोई बुरा नहीं मानता बल्कि सब ही उसे लाइक करते है.


हक़ीक़ी दुनिया मे हम किसी से बोले की अपने मां बाप की सेवा करो तो वह बोलेगा जा अपनी देख पहले, यहाँ लोग तारीफों के कमैंट्स करते है, सुबह 6 बजे ख़ुद जाग कर नमाज़ पढी हो या ना पढी हो, पूजा पाठ किया हो या नहीं, लेकिन आँख खुलते ही हम आस्तिक हो जाते है, ऐसा लगता है हम दुनिया के सबसे बडे धार्मिक और अधयत्मिक इंसान है जो सुबह उठते ही पूरी दुनिया मे ज्ञान बाटने निकला है, और हम बहुत बढीया बढीया पोस्ट करने लगते है, लेकिन चाहे कुछ भी हो सोशल मीडिया की दुनिया हक़ीक़ी दुनिया से बेहतर नज़र आने लगी है, हक़ीक़ी दुनिया मे  रिश्तो की कोई अहमियत नहीं है, सब एक दूसरे के गले काटने मे ज्या़िदा मसरूफ है, लेकिन सोशल मीडिया पर जी भर के, पेट भर के प्यार बरसता है.

कोई भी टेढ़े मेढे मुँह बनता फोटो डाल दो आपके फ्रेंड्स दीवाने हो जाते है, उस वक्त़ दुनिया में आप से ज्या़िदा खूबसूरत इंसान कोई नहीं होता, इतना प्यार, इतना प्यार बरसता है की आप को शायद गुमान होने लगे की आप आप ही है ना, इतनी मिठास की डाइबिटीज़ होने का डर होने लगे, लेकिन हकीकत यह है की यह सब दिखावा है, और कही न कही हम सब इससे वाक़िफ़ है, लेकिन शायद हम भी इस दिखावे के आदि हो चुके है,  शायद इसी लिए हम सोशल मीडिया से बहार निकलना नहीं चाहते, दिल चाहता है की हर पल यही रहे, यहाँ वो सब तारीफ प्यार और रिश्तो की मिठास मिलती है जो हक़ीक़ी दुनिया मे नदारद है, शायद इसलिए 5-10 मिनट इस दुनिया मे ना आओ तो बेचेनी होने लगती है,

लेकिन गुंडा गर्दी ने अपने पैर यहाँ भी पसार दिए है, गुंडों और घटिया इंसानो का एक टोला इस दुनिया मे भी बहुत एक्टिव रहता है, खास कर राजनितिक पार्टियों और अपने काले दिल को खादी मे ढकने वालो के पालतू, पूरे मन के साथ अपना काम करते है, उस गुंडागर्दी को एक इंग्लिश का सलीकेदार नाम दे दिया है, ट्रोलिंग, हम इसके भी आदि हो चुके है, वैसे एक बात है, किसी घटिया चीज़ को कोई अंग्रेजी नाम दे दो तो वो इतनी बुरी नहीं लगती, और हमें उसका आदि होने मे उसे सहज लेने मे ज़्यादा दिक्कत भी नहीं आती. 

एक बेवक़ूफ़ी है, इस सोशल मीडिया की दुनिया मे हम सब दिल लगा कर करते है, बिना समझे, बिना सच जाने, जो बात हम तक आती है उसे आगे खिसका देते है, पता नहीं हम अपनी बेवकूफी का सबूत देते है या शायद वजह यही है की इस सोशल मीडिया की दुनिया मे हम दूसरों पर ज़रूरत से ज्याि़दा भरोसा करते है, हमें लगता है वह तो सच का फरिश्ता है, झूट बोल ही नहीं सकता, तो हम बिना सच जाने, बिना समझे, पोस्ट आगे खिसका देते है, हक़ीक़ी दुनिया मे कोई किसी पर इतना भरोसा करता है? लोग का सोचना गलत है की तीसरा विश्व युद्ध परमाणु हथियारों का होगा, नहीं भाई वह सोशल मीडिया  पर लडा़ जायेगा, गालिया दे दे कर, ट्रोल कर के, अपशब्दों के परमाणु बाम गिराए जायेगें, जो लोग भाग जायेगें सोशल मीडिया बंद कर देगें वो हारे हुए मान लिए जायेगें.

तक़रीबन ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया पर अपने चेहरे पर मास्क लगा कर आते है, जिनके घरों मे परदे का चलन नहीं है, वो भी परदे पर ज्ञान बाटते है, चाँद सिक्कों की ख़ातिर रिश्ते बिगाड़ लेने वाले लोग आपसी भाईचारा और मुहब्बत का मसीहा बन कर पोस्ट डालते है, झूट और फरेब का रिज़्क़ अपने बच्चों को खिलने वाले लोगों के सोशल मीडिया स्टेटस वफादारी और सेक्रिफाइज का ज्ञान देने वाली पोस्ट्स से भरा पड़ा है, हमने दुनिया को सुधारने का ठेका लिया हुआ है वोह भी सोशल मीडिया के ज़रिये, यहाँ हर शख़्स अपने आप मे सही और आला है, बस सामने वाला गुमराह है, सामने वाला नासमझ है जिसे समझाने की ज़रूरत है, लेकिन क्या, कभी हम आईने के सामने खडे हो कर ख़ुद से पूछते है की में केसा हूँ? मैं क्या हूँ? में खुद किस हद तक इन सभी चीज़ों को अपनी ज़िन्दगी मे उतर चूका हूँ जिसका ज्ञान में सोशल मीडिया पर बांट रहा हूँ? कही हम दिखावे की ज़िन्दगी तो नहीं जी रहे? अगर हम सब लोग इतने ही शरीफ, इतने ही सीधे, इतने ही ईमानदार है, इतने ही बड़े ज्ञानी है की दुनिया को सोशल मीडिया पर ज्ञान बाँट रहे है, इतने ही दरियादिल और अपनों से इतनी ही मुहब्बत करने वाले हैं, तो फिर हमारी हक़ीक़ी ज़िन्दगी और हमारी दुनिया इतने बुरे हालात मे कैसे है, और क्यों है?

सवाल का जवाब तलाशिये, शायद गूगल पर मिल जाए।

पढ़ने के लिए शुक्रिया

#socialmedia #zakiansariquotes #samaj #indianwriters


माशा अल्लाह अब्दुल, माशा अल्लाह, ऐसा लग रहा है जैसे यह ताज़िया अभी खुद हुसैन की शहादत सुना देगा, कितना खुशनुमा, कितना खूबसूरत ताज़िया बनाया है तुमने, भाई वाह क्या करामात अता की है अल्लाह ने तुम्हारे हांथो को. इतना सुनते ही अब्दुल के दिल में ख़ुशी और सुकून की ऐसी लहार दौड़ी की उसकी रौनक चेहरे पर नज़र आने लगी, इतने बड़े आलिम, इतने बड़े अल्लाह वाले मौलाना सय्यद ज़ाफ़री साहिब ने अब्दुल के बनाये ताज़िये की ऐसी तारीफ की उसे यक़ीन नहीं हो रहा था, अब्दुल पिछले कई सालों से बड़े चौक का ताज़िया बना रहा है, लेकिन हर साल उसके लिए एक चेलेंज की तरह होता है, क्या शान है बड़े चौक के ताज़िये की, अगर कोई कमी रह जाये तो..... बड़े चौक का ताज़िया जिसकी करामात तो खुली क़िताब है, हज़ारो लोग फ़ैज़याब हो चुके है, कई सुनी गोद भर दी है, कितनों को अपनी रहमत से नवाज़ा है, कहाँ कहाँ से लोग इसकी ज़ियारत को नहीं आते. बड़ी शान है बड़े चौक के ताज़िये की, कभी इसे चार या पांच लोग उठा नहीं सके चाहे कितने ही ताक़तवर क्यों न हो लेकिन जैसे ही छठा हाथ लगता है ताज़िया रुई की तरह उठ जाता है, पिछले बीस दिन से अब्दुल लगा था जी तोड़ मेहनत खाना पीना सब बराबर अब उसे लगा की उसकी मेहनत का अज्र मिल गया, अब्दुल इसके लिए कोई मेहनताना तलब नहीं करता है, हुसैन का काम है बस यही सोच कर करता है. जल्दी से उसने सकीना को कॉल किया की ताज़ियेदारी होने ही वाली है वोह जल्दी आ जाये मन्नत के लिए, इंशाल्लाह इस साल हुसैन के सदके में बेटा मिल ही जायेगा, अब्दुल और सकीना के एक 12 साल की बेटी अमरीन है, अब एक बेटा भी हुसैन अता कर दे तो नस्ल का सिलसिला आगे बढ़ता रहे, सकीना अमरीन को लेकर निकल चुकी थी, तेज़ क़दमों के साथ इसलिए की उसे पता था ज़्यादा देर हुई तो हज़ारों का मजमा हो जायेगा, ज़ियारत भी ठीक से नहीं हो सकेगी, रस्ते में  ही उसने दोहराया सब रख लिया है नारियल, फूल, लाल धागा और चिरागी के 501 Rs भी अलग रख दिए है, तभी उसे याद आया की तबर्रुक लेना भूल गई, जल्दी से तबर्रुक भी हलवाई की दुकान से ले लिया। हाँफते हाँफते  ही पहुंची लेकिन ज़ियारत ठीक से हो गई, अभी इतने लोग नहीं थे, नारियल चढ़ा कर लाल धागा बेटे की मन्नत का बांध दिया और वादा भी किया की बेटे का नाम हुसैन ही रखेगी,  अब्दुल को अभी रुकना था इसलिए दोनों माँ बेटी ज़ियारत कर के लोट चली, कितनी रौनक थी बाजार में, हर तरफ खिलोने वाले, चाट पकोड़ी, मिठाई रबड़ी के ठेले, शरबत की छबीले जगह जगह पर, बच्चो के लिए तो मुहर्रम ईद से भी बढ़ कर है भला ईद पर कौन फ्री का शरबत  पिलाता है, यह तो हुसैन और हसन के सदके का तबर्रुक है,  गुलाब शरबत की छबील बड़ी मशहूर है, सकीना ने कहा चल तबर्रुक ले लेते है, दोनों ने एक एक गिलास पिया लेकिन सकीना को अंदाज़ा हो गया की महगाई का असर दिख रहा है, पानी ज़्यादा है अब पहले वाली बात नहीं है, लाला जी चाट वाले को देख कर अमरीन के मुँह में पानी आ गया ज़िद करने लगी, सकीना इस शर्त पर राज़ी हुई की बस एक प्लेट ही, उसके बाद कुछ नहीं, कोई खिलौना नहीं, कोई झूला नहीं, मेले मैं घूमना नहीं, सीधे घर चलेगें, अमरीन ख़ुशी ख़ुशी राज़ी हो गई, 

अब्दुल के लिए अब सख्त वक़्त था इसलिए नहीं के उसे थकान हो रही थी, लेकिन इसलिए की एक रंज कही उसके दिल में था, मुहर्रम का जलूस अपनी राह पर निकल चला था, तकलीफ होती है अब्दुल को यह देखते हुए की इतने दिन की मेहनत लगन से जिसे अपने हाथो से बनाया उसे अपने ही हाथो से पानी में ठंडा करना है, लेकिन, कर्बला और हसन हुसैन की शहादत हमें यही सबक़ तो देती है" क़ुरबानी " और "सब्र"

अब्दुल की आँख से एक आंसू टपका जब उसने ताज़िये का आखरी छोर पानी में  ठंडा होते हुए देखा। भरी क़दमों से घर की तरफ लौट गया.

सकीना खाना गर्म कर के ले आई थी, अमरीन टीवी देख रही थी, टीवी पर गणेश चतुर्थी पर डॉक्यूमेंट्री आ रही थी, दिखा रहे थे कैसे गणेश जी बनाये जाते है, उन्हे विराजमान क्या जाता है कैसे लोग मन्नते मांगते है और कैसे वह दुखद पल जब उनका विसर्जन कर दिया जाता है, देखते देखते अब्दुल के चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान उभर आई,  सकीना से मुख़ातिब हो कर बोला " यह हमारे हिन्दू भाई भी कितने भोले है, अपने ही हाथों से मूर्ति बनाते है उसी से मन्नत मांगते है और उसी को पानी में विसर्जित कर देते है," अमरीन के कानों तक यह अल्फ़ाज़ पहुंचे तो उसे शायद कुछ समझ नहीं आया, शायद कोई सवाल उसके ज़हन से टकराया हो,अब्दुल से पूछना चाहती थी लेकिन अब्दुल प्लेट लेकर किचन की तरफ चला गया तो अमरीन अपने आप से बुदबुदाने लगी

पिछले  कई दिनों से अब्बू यही तो कर रहे है, अपने हाथ से ताज़िया बनाया, अम्मा ने नारियल चढ़ा कर उससे मेरे लिए भाई की मन्नत मांगी, हम सब से तबर्रुक भी खाया, और अब्बू उसे पानी में ठंडा कर आये, अगर यह गलत है तो वह सही कैसे था, और वह सब सही था तो यह सब ग़लत कैसे है?

कोई नहीं जनता अमरीन को उसके इस सवाल का कोई जवाब मिलेगा भी या नहीं, लेकिन यह सवाल इस बात की अलामत है की तोहिद ने उसके दिल और ज़हन पर दस्तक दे दी है.

#muharram #taziya #islam #muslim


 


"मुसलमान का ईमान" 
मुसलमान का ईमान एक मोबाइल ठीक कराना था, चार्जिंग सॉकेट में प्रॉब्लम थी, तो बाज़ार की तरफ गया जहां मोबाइल रिपेयर की दुकाने है, यहाँ ज़्यादातर दुकाने ताजाकि और कज़ाकिस्तानी मुस्लिम्स की है जो मोबाइल और इलेक्ट्रिक आइटम्स रेपेयर करते है, एक दुकान पर पंहुचा और पूछा यह मोबाइल ठीक कराना है, हो सकता है? मोबाइल हाथ में लेते हुए उसने पूछा, " कहा इंडिया से हो ?"  मैंने कहा " हाँ " उसने आगे पूछा " मुस्लिम ?" मैंने कहा "हाँ "  फिर उसने सलाम किया , मैंने सलाम का जवाब दिया, उसने मोबाइल वर्कर को दिया, अपनी लैंग्वेज में कुछ बोला, वर्कर मोबाइल देखने लगा, और वह बंदा मुझसे बात करने लगा ज़ाकिर नाइक के बारे में बोला उसे सुनता हूँ मेरे क्रिस्टियन दोस्तों को भी उसके वीडियो दिखता हूँ. यह बात चल रही थी, तभी उसके वर्कर ने कुछ बोला, फिर वह बंदा मुझसे बोला, 15-25 मिनट लगेगा ठीक हो जायेगा और 1200 रुबले लगेंगें, मैंने कहा नहीं 1200 तो बहुत ज़ियादा है, इतने का काम थोड़ी है, फिर वह बोला नहीं यह Type C है इसलिए कॉस्टली है, चलो आप भी मुस्लिम हो, 1000 रुबले दे दो , मैंने कहा नहीं यह ज़ियादा है मैं 800 दे सकता हूँ, उसने मना कर दिया बोला नहीं 800 में नहीं होगा 1000 तो मैंने इसलिए बोलै की आप भी मुस्लिम ही हो, मैंने मोबाइल वापिस लिया और आगे बढ़ गया, फिर एक और दुकान पर पंहुचा, पहुंच कर मोबाइल दिया, दुकानदार ने मोबाइल देखा और बोला 700 रुबले लगेंगें हो जायेगा, मैंने बोला ठीक है कर दो, उसने कहा 20-25 मिनट लगेंगें, मैं वही रुक गया उसका वर्कर मोबाइल ठीक करने लगा, तभी उसने पूछा इंडिया से हो ? मैंने कहा हाँ, फिर थोड़ा बात चित हुई तो उसे पता चला की मैं मुस्लिम हूँ, तो उसने कहा आप लोगो के रमज़ान चल रहे है आप रखते हो, मैंने कहाँ हाँ, उसने कहाँ हमारे क्रिस्टियन के भी फ़ास्ट चल रहे है मैं भी रखता हूँ, लेकिन हमारे फ़ास्ट आपके रमजान की तरहां मुश्किल नहीं होते, आप के रमज़ान तो बहुत टफ होते है, इतनी देर में मोबाइल ठीक हो गया, मोबाइल चेक किया, मैंने उसे 700 रुबले निकल कर दिए , उसने 100 रुबले वापिस कर दिए, मैंने पूछा तुमने 700 कहा था, उसने कहा हाँ, लेकिन 100 रुबले आप को डिस्काउंट आप रोज़े से हो,आप से ज़ियादा लूंगा तो गॉड नाराज़ हो जायेगा उसने हँसते मुस्कुराते बोला और 100 रुबले वापिस कर दिये, 1200 रुबले में जो काम एक वह  कर रहा था और 200 का डिस्काउंट दे कर मुस्लिम होने का अहसान जाता रहा था, वही काम एक इस शख्स ने 700 रुबले में किया और रोज़े का 100 रुबले डिस्काउंट भी दे दिया यह मेरे साथ एक क्रिस्टियन का सलूक था. और पहले वाला एक्सपेरिएंस एक मुस्लिम के साथ। पूरी कौम को किसी एक शख्स से नहीं तोला जा सकता लेकिन यह भी सच है की मुसलमानों में अब ऐसे लोगो वाला पढ़ला बहुत भारी है  मुसलमान को कोई हक़ ही नहीं की वह किसी दूसरी क़ौम को इलज़ाम दे,जो ज़िल्लत और सलूक आज दुनिया में मुसलमानों के साथ हो रहा है यह उसने खुद कमाया है. किसी ने कोई साजिश नहीं की, दुनिया भर की क़ौमों में साजिश तलाशने की बजाये मुसलमानों को अपने ईमान तलाशने की ज़रूरत है.  ज़की अंसारी ( Russia) बात चित रशियन में हुई थी, उसका ट्रांसलेशन लिखा है 20-04-2022