मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं 
बड़ी ज़रूरत है वसीलों की ज़माने को 
गर मिल जाए कोई बुजुर्ग तो एक दरगाह खोल लूं


तबर्रुक, सिन्नी, ग़िलाफ़ फूल कई काम चल जायेगें
जितने हैं बेरोज़गार ख़ानदान मे, सब रोज़ी से लग जायेगें
टीले वाले मज़ार पर, चढा के चादर मांगी यही इक दुआ
मिल जाए जगह कुशादा आप जेसी,
तो मे भी एक दरगाह खोल लूं
मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं


करामातों की सच्ची एक, क़िताब छपवा दूंगा
बच्चा देते 40 दिन मे, पर्चे बटवा दूंगा
500 वाली चादर तुमको रोज़ी भी दिलवाएगी
गर चढ़ा दो 2000 की, जन्नत भी मिल जाएगी
वक़्त हो चाहे जितना तेढा, बाबा पार लगाते बेढा
अच्छे अच्छे कुछ एसे कलीमात सोच लूं
मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं


भूत प्रेत आसाब असर , सब का इलाज इधर है
जिन्नातों का भी, पक्का जुगाड इधर है,


पढेंगे नाते राग अलाप के, मस्त माहोल बन जायेगा,
हाज़री वाले क़व्वालों का, स्टेज इधर सज जायेगा,


अब बडा के दाढी मे भी ख़ादिम वाला, चोला ओढ लूं 
बड़ी ज़रूरत है, वसीलों की ज़माने को, 
अब में भी एक दरगाह खोल लूं.
मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं 


#zakiashkim #urdupoetry #islamicpoetry #dargah

 




वही करेगा फ़ैसला और वही देगा अब दलील

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील


गिरफ़्त करने से पहले वो इशारे हज़ार देता है,

सुधर जा अगर सुधर सके, ख़ामोशी से कहता है।

मगर जब ज़ुल्म हद से गुज़र जाए,

करता है ज़ालिम को ज़लील।

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील,

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील।


यह लंबी है लड़ाई, अब आख़िरत तक जाना है, 

वो दुनिया की अदालतों की सोचे बैठे हैं। 

हमें तो अब अपने रब की अदालत तक जाना है। 


हमने उसकी रज़ा पर छोड़ा है अपना मुक़दमा, 

वही करेगा फ़ैसला और वही देगा अब दलील

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील, 

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील।


वो है मुहाफ़िज़ मेरा, फिर किसी का ख़ौफ़ नहीं
उसके आगे ताक़तवर कोई फ़िरौन नहीं

मेरे सब्र की एक वही है दलील,
हर भरोसे की है , वही एक तकमील,
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील

सजदे में सर के साथ, फ़िक्रें भी मैंने रख दीं,
हर बेचैनी अपनी , उसकी बारगाह में रख दी
मुझे दुनिया की दिलजोही से क्या लेना
हर उम्मीद आख़िरत में उसकी रज़ा पर रख दी

वही तो मालिक है उस दिन का,
वही मुन्सिफ़ क़यामत में, वही तो है वकील
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील


 जब मर्द बिरयानी के बदले औरत के जिस्म की ललक रखे,

और डॉक्टर लाशों पर हँसना सीख जाएँ।

तो समझ लो फसल वही है, बीज हमने बोए थे।


₹370 की बिरयानी, और बदले में वसूली चाहिए

थोड़े से सिक्के, और औरत के जिस्म पर क़ब्ज़ा चाहिए


बाहर वाले ख़ुद को जैसे-तैसे बचा ही लेंगे

पर इस सोच के मर्द से उसी के घर की औरतों को डरना चाहिए


फरिश्ता समझते हैं उन्हें जिन्हें ज़मीं पर 'डॉक्टर' कहते हैं

कम से कम अपने पेशे की तो इज़्ज़त करनी चाहिए


मुर्दों के आज़ा देखकर हँसते हैं जो लाश पर

मिल जाए कहीं तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए


और कब तक उठाए फिरेंगे बोझ तमीज़ और तहज़ीब का ?

नए ज़माने में तो कुछ बदअख़्लाक़ी भी 'नई ' चाहिए


उरियानी सड़क पर, बेहयाई ज़बान मे, फाहशी सोच मे 

क्या वाक़ई यही तरक़्क़ी है जिसे हमें अपनाना चाहिए? 


हम ने खुद उड़ा दी मज़ाक मे वो बात, जो मज़ाक नहीं थी 

केसी हो तरबियत बच्चो की हमें फिर से सोचना चाहिए


और जो फसल उग रही है, बस उसी का तो क़ुसूर नहीं है,

बीज किसने बोए थे, यह सवाल भी होना चाहिए।


कठघरे में सिर्फ़ गुनहगार नहीं, मुआशरा भी खड़ा है,

उजड़े गर बाग़ तो....

कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए।

हाँ, कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए

#zakiansaripoem #379kibiryani #hidipoem #urdupoetry


 "मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

ग़दीर-ए-ख़ुम में जो गूंजा था क़ौल-ए-मुस्तफ़ा

वो ऐलान-ए-मोहब्बत ही काफ़ी है

अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है


"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

फ़हाज़ा अली उन मौला"


हिजरत की रात जान हथेली पर रख कर

सो गए रसूल अल्लाह के बिस्तर पर

वफ़ा का ये अंदाज़ ही काफी है

अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है


"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

फ़हाज़ा अली उन मौला"


जो हुआ ख़ैबर के मौके पर मौजिज़ा

रोज़ कहा हुआ करते हैं

रसूल अल्लाह ने फ़रमाया

"कल अलम दूंगा हाथ में उसके

अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं"


सुबह हुई तो नाम-ए-अली रोशन हुआ

अलम अली के हाथों में ज़ाहिर हुआ

कौन है अली ये बताने को

ख़ैबर का वो मंज़र ही काफ़ी है

अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है


"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

फ़हाज़ा अली उन मौला"


"मन कुंतो मौला"

"फ़हाज़ा अली उन मौला"

04/ june/2026

#ghadeerkhum #molaali #ali #islamicpoetry #islamic #muslim #urdupoetry #urdunazm #manqabt #islamichistory



 क़ाला रसूलुल्लाह ﷺ :
“इन्नी उरीतु फ़ी मनामी, का-अन्ना बनी हकम इब्नि अबी अल-आस,
यनज़ूना अला मिनबरी, कमा तनज़ू अल-क़िरदह।”

मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

शाम से चली थी एक ज़ुल्म की आँधी
मदीने की फ़िज़ाओं पर ख़ौफ़ के बादल ठहर आए

हालात थे इस क़दर, गर्द में लिपटे हुए
गुज़रते लम्हे, आने वाले वक़्त को न पढ़ पाए
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”
फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”

न जाने क्यों तारीख़ ने कम लिखा वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा

कुछ ऐसे भी सच है, हम जिससे वाक़िफ़ हो पाए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

बहा ख़ून कर्बला मे, आलम ए इस्लाम को, सुर्ख़ कर गया
जो ज़िंदा था ज़मीर से, वो बैअत-ए-जबर से फिर गया
ज़ालिमों को, इश्क़-ए-अहल-ए-बैत गवारा न हुआ,
सो कुचलने को, आल-ए-रसूल की मोहब्बत,
एक लश्कर, मदीने की जानिब रवाना हुआ,

फिर से एक बार, कर्बला का मंज़र दोहराया गया,
नबी के शहर को ख़ून से नहलाया गया,

मासूम बेटियों के रुख़सार से हिजाब छीना गया.
पाक ख़ातूनों की हुरमत को भी लूटा गया

मिम्बरे रसूल पर बांधे गए ग़लीच घोड़े
मस्जिद ऐ नबवी की, अज़मत को टापों तले रौंदा गया ,

सहमे हुए थे, दर-ओ-दीवार शहर-ए-तय्यबा के,
मातम में डूबे हुए थे, घर अंसार के,
अज़ाँ भी रो के पढ़ी जाती थी, उन दिनों शायद,
नमाज़ों में भी छलक उठते थे, अश्क दर्द के ,

सदियों यह शहर इस ज़ख्म से उभरा नहीं, 
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं,
बाद उसके आप मुस्कुराए नहीं ,

दो गवाह काफी होते हैं, जुर्म साबित करने को.
फिर भी लोग बेचैन हैं, उसे रज़ी अल्लाह कहने को,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
तारीख मे ज़िंदा, दूसरा गवाह है वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा

मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे,
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
यह दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के, 
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

#harra #karbala #madina #mohammedzakiansari #zakiashkim #waqiyaharra #yazid #islam #historyofislam #karbalakikahani



दादा लड़ा था नाना से,
बाप लड़ा था वालिद से।

पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।
पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।

पहुँची थी अपने उरूज पर कर्बला में दुश्मनी,
जो शुरू हुई मक्का में रसूलुल्लाह की विलादत से।

गर तलाश हो हक़ की, तो सच को समझना पड़ेगा,
तारीख़ को सिर्फ़ जंग नहीं, इंसाफ़ से पढ़ना पड़ेगा।

मजबूरी थी फ़त्ह-ए-मक्का,
न करते क़ुबूल दावत, तो क्या करते?
आ गए साये में इस्लाम के,पढ़ा कलिमा डरते-डरते।

वक़्त-ब-वक़्त साया-ए-तकरार बढ़ता गया,
नस्ल-दर-नस्ल ईमान का पैमाना घटता गया।

आते-आते तीसरी नस्ल, ख़ून तक़रीबन काफ़िर हो गया।
शाम के बादशाह का बेटा, क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।
क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।

जो मिटाने चले थे अहल-ए-बैत को,
अपनी नस्ल पर दाग़ लगा बैठे।
कर्बला में लगाई आग,
और ख़ानदान अपना जला बैठे।

वो मर के मलऊन हो गया, मुआविया का लख़्त-ए-जिगर।
अली के चिराग़ आज भी रोशन हैं, आँधियों से बेफ़िक्र।

तन से जुदा होकर भी रहा बुलंद, नेज़ों पर सर जिसका।
वो हुसैन हैं।
वो कभी हारे नहीं,
कर्बला में बस जीते ही हुसैन हैं।

हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।
हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।

#qarbalakikahani #urdupoem #zakiahskim #urdukahani #shaeri #shayeri #qarbalakijung

#qarbalakikahani #urdupoem #zakiahskim #urdukahani #shaeri #shayeri #qarbalakijung



 

 

आओ कुछ नए अंदाज़ मे ईद मनाएँ
ईद के लिए ख़ुद को कुछ ऐसे सजाएँ

ना सिर्फ़ धागों से बुना हो नया लिबास,
ना इसमें दिखावे का हो कोई एहसास,
शफ़क़्क़त से तैयार हुआ ऐसा जोड़ा
जो दे नरमी का इक अंदाज़-ए-ख़ास

अपनेपन का इत्र कुछ यूँ लगाएँ,
मोहब्बत की महक से ख़ुद को महकाएँ,
तक़सीम करें इसे दिल खोल कर यूँ,
ख़ुशनुमा हो जाएँ ज़माने की सारी फ़िज़ाएँ 🌙

हमारा अंदाज़-ए-बयां यूँ ही रहे ख़ास,
लहजा हो जैसे एक शिफ़ा, नरम हों अल्फ़ाज़।
ज़ुबां पर रहे मिठास शीर की हर बात में,
शीरीन रहे ईद का लज़ीज़ मिजाज़ ✨

अहंकार, ग़ुस्सा और ग़ुरूर की ऊँचाई,
दूर रहे अहम् और मैं की परछाई
किना और रंजिश से रूह को आज़ाद करो
जो अपने है दिल से उनकी क़द्र करो ✨

बना दो यादगार हर लम्हे को
ख़ूबसूरत यादों के तोहफे बांटों
दोस्तों और रिश्तेदारों को
अमन और मुहब्बत की मिसाल बनाएं
आओ कुछ नए अंदाज़ मे ईद मनाएँ


#EidMubarak2026 #EidPoetry #UrduShayari #EidUlFitr #ZakiAshkim #PeaceAndLove #Eid2026 #IslamicPoetry #HeartHealingPoem

سم الله الرحمن الرحيم
एक नज़र मिली थी कभी, एक नज़र से,
वो नज़र अनजान नहीं, कुछ अपनी सी नज़र आई।
ख़ुदा का इशारा था, थाम लो हाथ एक दूजे का,
आसमां पर बनी यह जोड़ी, दिल से एक आवाज़ आई।

सुन्नते रसूल से इस रिश्ते का आगाज़ हुआ है,
कितनी मुबारक घड़ी है, दूल्हे का सहरा सजा हुआ है।
गवाह बने हैं फ़रिश्ते भी इस दिलकश नज़ारे के,
ख़ुदा के फ़ज़ल से यह निकाह मुक़म्मल हुआ है।

इन्किसारी हमेशा रहे बन के इस रिश्ते का ताज,
उम्र भर साथ निभाने का किया वादा आज।
दुआओं की छाव मे हर ख़्वाब करे परवाज़
सोफिया और फ़राज़ अब सदा के लिए हमसफ़र हमराज़।

दुल्हन की हया इस रिश्ते का गहना आला हो,
दूल्हे की वफ़ाओं ने जिसे अदब से सँभाला हो।
गुलों से गुलज़ार रहें रास्ते ज़िंदगी के,
हर सुबह, हर शाम राहों में चमकता उजाला हो।

नींव रखी है दिलों ने वफ़ा और अहतराम की
रंग लाएगी गहरा तासीर इनके नाम की

सोफिया की हिक्मत, फ़राज़ की बुलंदी,
यह ख़ासियत खूबसूरत घर सजाएगी ।
इंशाल्लाह ख़ानदान ऐ अंसार में इनकी दास्तां ,
अपना एक अलग ही मुक़ाम बनाएगीं ।

नज़र-ए-बद रखे फ़ासले, इस घर की दहलीज़ से,
महके कोना-कोना, बरकतों के फूल से।
ख़ुदा की रहमत बरसती रहे हर लम्हा,
खुशियों से शाद रहे उम्र का हर एक लम्हा।

ख़िराजे अक़ीदत पेश करते है
तहे दिल से रब का शुक्र अदा करते हैं,
इल्तिजा, दुआ, और मन्नतें उसकी बारगाह में यही है
सदा खुश रहे, आबाद रहे दूल्हा-दुल्हन,
बस एक यही दुआ हम बार-बार करते हैं।

रब की रज़ा हुआ इस रिश्ते का आगाज़
सोफिया और फ़राज़ अब सदा के लिए हमसफ़र हमराज़।
सोफिया और फ़राज़ अब सदा के लिए हमसफ़र हमराज़।”

tags: marriage-poem, mohammed-zaki-ansari, muslim-weddings, sahara-special, zakiansaripoems, zakiashkim0 likes