उम्मते मुस्लिमा थी जो कभी,
अब कोई देवबंदी, कोई ब्रेलवी, कोई अहले हदीस हो गया
रुसवाई और ज़िल्लत मुक़द्दर है बिखरी हुई क़ौम का
और हर फ़िरक़े को यह खुशफ़हमी, जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया
जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया
तीन सो तेरह थे बदर मे , जैसे एक जिस्म एक जान थे
सहाबी हुए किसी के, अहले बेत किसी के,
सुन्नते रसूल का भी, अब बटवारा हो गया
क़िब्ला तो वही एक है सबका,
और एक दुसरे के लिए, मुसलमां इस्लाम से ख़ारिज हो गया ,
हर फ़िरक़े को यह खुशफ़हमी, जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया,
उम्मते मुस्लिमा थी जो कभी,
अब कोई देवबंदी, कोई ब्रेलवी, कोई अहले हदीस हो गया
रुसवाई और ज़िल्लत मुक़द्दर है बिखरी हुई क़ौम का
और हर फ़िरक़े को यह खुशफ़हमी,
जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया
जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया
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