क़ाला रसूलुल्लाह ﷺ :
“इन्नी उरीतु फ़ी मनामी, का-अन्ना बनी हकम इब्नि अबी अल-आस,
यनज़ूना अला मिनबरी, कमा तनज़ू अल-क़िरदह।”

मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

शाम से चली थी एक ज़ुल्म की आँधी
मदीने की फ़िज़ाओं पर ख़ौफ़ के बादल ठहर आए

हालात थे इस क़दर, गर्द में लिपटे हुए
गुज़रते लम्हे, आने वाले वक़्त को न पढ़ पाए
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”
फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”

न जाने क्यों तारीख़ ने कम लिखा वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा

कुछ ऐसे भी सच है, हम जिससे वाक़िफ़ हो पाए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

बहा ख़ून कर्बला मे, आलम ए इस्लाम को, सुर्ख़ कर गया
जो ज़िंदा था ज़मीर से, वो बैअत-ए-जबर से फिर गया
ज़ालिमों को, इश्क़-ए-अहल-ए-बैत गवारा न हुआ,
सो कुचलने को, आल-ए-रसूल की मोहब्बत,
एक लश्कर, मदीने की जानिब रवाना हुआ,

फिर से एक बार, कर्बला का मंज़र दोहराया गया,
नबी के शहर को ख़ून से नहलाया गया,

मासूम बेटियों के रुख़सार से हिजाब छीना गया.
पाक ख़ातूनों की हुरमत को भी लूटा गया

मिम्बरे रसूल पर बांधे गए ग़लीच घोड़े
मस्जिद ऐ नबवी की, अज़मत को टापों तले रौंदा गया ,

सहमे हुए थे, दर-ओ-दीवार शहर-ए-तय्यबा के,
मातम में डूबे हुए थे, घर अंसार के,
अज़ाँ भी रो के पढ़ी जाती थी, उन दिनों शायद,
नमाज़ों में भी छलक उठते थे, अश्क दर्द के ,

सदियों यह शहर इस ज़ख्म से उभरा नहीं, 
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं,
बाद उसके आप मुस्कुराए नहीं ,

दो गवाह काफी होते हैं, जुर्म साबित करने को.
फिर भी लोग बेचैन हैं, उसे रज़ी अल्लाह कहने को,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
तारीख मे ज़िंदा, दूसरा गवाह है वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा

मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे,
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
यह दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के, 
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

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दादा लड़ा था नाना से, बाप लड़ा था वालिद से
पुरानी थी नफ़रत, मलऊन यज़ीद की हुसैन से
पहुँची थी अपने उरूज पर कर्बला में दुश्मनी
जो शुरू हुई मक्का में, रसूल अल्लाह ﷺ) की विलादत से

गर तलाश हो हक़ की, तो सच को समझना पड़ेगा
तारीख़ को सिर्फ़ जंग नहीं, इंसाफ़ से पढ़ना पड़ेगा

मजबूरी थी फतह-ए-मक्का,
मजबूरी थी फतह-ए-मक्का, ना करते क़ुबूल दावत तो क्या करते,
आ गए साये में इस्लाम के, पढ़ा कलमा डरते-डरते

वक़्त बा वक़्त साया-ए-तकरार बढ़ता गया,
नस्ल दर नस्ल ईमान का पैमाना घटता गया,

आते-आते नस्ल तीसरी, ख़ून तक़रीबन काफिर हो गया
शाम के बादशाह का बेटा , क़ातिल-ए-हुसैन हो गया
क़ातिल-ए-हुसैन हो गया

जो मिटाने चले थे अहले-बैत को, अपनी नस्ल पर दाग़ लगा बैठे
कर्बला में लगाई आग और…,
और ख़ानदान अपना जला बैठे

वो मर के मल ऊन हो गया, मुआ वियाह का लख्ते-जिगर
अली के चिराग़ आज भी रोशन हैं, आँधियों से बेफिक्र
तन से जुदा हो कर भी रहा बुलंद नेज़ों पर सर जिसका
वो हुसैन हैं

वो कभी हारे ही नहीं, कर्बला में बस जीते ही हुसैन हैं
हर मोमिन के सीने में आज भी ज़िंदा हुसैन हैं
हर मोमिन के सीने में आज भी ज़िंदा हुसैन हैं


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आओ कुछ नए अंदाज़ मे ईद मनाएँ
ईद के लिए ख़ुद को कुछ ऐसे सजाएँ

ना सिर्फ़ धागों से बुना हो नया लिबास,
ना इसमें दिखावे का हो कोई एहसास,
शफ़क़्क़त से तैयार हुआ ऐसा जोड़ा
जो दे नरमी का इक अंदाज़-ए-ख़ास

अपनेपन का इत्र कुछ यूँ लगाएँ,
मोहब्बत की महक से ख़ुद को महकाएँ,
तक़सीम करें इसे दिल खोल कर यूँ,
ख़ुशनुमा हो जाएँ ज़माने की सारी फ़िज़ाएँ 🌙

हमारा अंदाज़-ए-बयां यूँ ही रहे ख़ास,
लहजा हो जैसे एक शिफ़ा, नरम हों अल्फ़ाज़।
ज़ुबां पर रहे मिठास शीर की हर बात में,
शीरीन रहे ईद का लज़ीज़ मिजाज़ ✨

अहंकार, ग़ुस्सा और ग़ुरूर की ऊँचाई,
दूर रहे अहम् और मैं की परछाई
किना और रंजिश से रूह को आज़ाद करो
जो अपने है दिल से उनकी क़द्र करो ✨

बना दो यादगार हर लम्हे को
ख़ूबसूरत यादों के तोहफे बांटों
दोस्तों और रिश्तेदारों को
अमन और मुहब्बत की मिसाल बनाएं
आओ कुछ नए अंदाज़ मे ईद मनाएँ


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سم الله الرحمن الرحيم
एक नज़र मिली थी कभी, एक नज़र से,
वो नज़र अनजान नहीं, कुछ अपनी सी नज़र आई।
ख़ुदा का इशारा था, थाम लो हाथ एक दूजे का,
आसमां पर बनी यह जोड़ी, दिल से एक आवाज़ आई।

सुन्नते रसूल से इस रिश्ते का आगाज़ हुआ है,
कितनी मुबारक घड़ी है, दूल्हे का सहरा सजा हुआ है।
गवाह बने हैं फ़रिश्ते भी इस दिलकश नज़ारे के,
ख़ुदा के फ़ज़ल से यह निकाह मुक़म्मल हुआ है।

इन्किसारी हमेशा रहे बन के इस रिश्ते का ताज,
उम्र भर साथ निभाने का किया वादा आज।
दुआओं की छाव मे हर ख़्वाब करे परवाज़
सोफिया और फ़राज़ अब सदा के लिए हमसफ़र हमराज़।

दुल्हन की हया इस रिश्ते का गहना आला हो,
दूल्हे की वफ़ाओं ने जिसे अदब से सँभाला हो।
गुलों से गुलज़ार रहें रास्ते ज़िंदगी के,
हर सुबह, हर शाम राहों में चमकता उजाला हो।

नींव रखी है दिलों ने वफ़ा और अहतराम की
रंग लाएगी गहरा तासीर इनके नाम की

सोफिया की हिक्मत, फ़राज़ की बुलंदी,
यह ख़ासियत खूबसूरत घर सजाएगी ।
इंशाल्लाह ख़ानदान ऐ अंसार में इनकी दास्तां ,
अपना एक अलग ही मुक़ाम बनाएगीं ।

नज़र-ए-बद रखे फ़ासले, इस घर की दहलीज़ से,
महके कोना-कोना, बरकतों के फूल से।
ख़ुदा की रहमत बरसती रहे हर लम्हा,
खुशियों से शाद रहे उम्र का हर एक लम्हा।

ख़िराजे अक़ीदत पेश करते है
तहे दिल से रब का शुक्र अदा करते हैं,
इल्तिजा, दुआ, और मन्नतें उसकी बारगाह में यही है
सदा खुश रहे, आबाद रहे दूल्हा-दुल्हन,
बस एक यही दुआ हम बार-बार करते हैं।

रब की रज़ा हुआ इस रिश्ते का आगाज़
सोफिया और फ़राज़ अब सदा के लिए हमसफ़र हमराज़।
सोफिया और फ़राज़ अब सदा के लिए हमसफ़र हमराज़।”

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Doesn’t matter if you wear it or not,
you’re gorgeous in every way.
Do you need lipstick? No way

But when the red shade of your lipstick
matches your dress,
it creates unmatched grace.

That shade rests like a soft shadow on your lips,
protecting them when the harsh wind tries to kiss.
Gentle, moist petals, charm of your pretty face
in your beauty it adds another grace

A glow words fail to describe
your tender lips, a natural vibe.

I hate anything that comes between;
I love to breathe the aroma of your skin.

When my breath drinks the nectar of your lips,
That shade becomes a barrier between our kiss.

That’s my only complaint about your lipstick.
But when the red shade matches your dress,
it creates unmatched grace.

Sometimes I feel the lipstick is so lucky,
it drinks the dew of your lips, where I long to be.

Most of the time on your lips it stays,
and in me, a soft jealousy it creates.
Sometimes I wish I were that red shade—
Each moment I would kiss your lips, unafraid.
Just thinking of it drives me mad.
On your moist lips, the shade of red
when it matches your dress,
it creates unmatched grace.


 निसार तेरी चहल-पहल पर हज़ारों ईद-ए-रबीउल अव्वल,

सिवाए इब्लीस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं।


कमज़ोर था इस्लाम इतना जो न सिखा सका तरीक़ा ख़ुशी मनाने का,

हम जुलूस की हिदायत नसरानियों से सीख कर आ रहे हैं।


और जैसे जाहिल मनाते हैं दिन कोई अपने किसी बड़े का,

वही जहालत हम ईद-मिलादुन्नबी में ला रहे हैं।


हमने भी कर ली है भीड़ इकट्ठी, हमारे हुजूम गलियों में नारे लगा रहे हैं,

अभी तो सिर्फ़ डीजे बजे हैं, कल ख़ुशी में सड़कों पर खुले नाच होंगे।

हम ख़ुशी मनाने के तरीक़े जाहिलों से सीख कर आ रहे हैं।


फ़ज्र तर्क हुई जुलूस की तैयारी में,

ज़ोहर थकान ने अदा न करने दी।

यूँ तो हज़ारों थे मुसलमान जुलूस की भीड़ में,

मोमिन को छोड़ कर सब नमाज़ से मुँह मोड़ कर जा रहे हैं।

इस तरह सिवाए इब्लीस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं।


शिरकत करे जो जुलूस में वही असली मुसलमान होते हैं,

डेक पर बजती नातों से मोहब्बत के दावे साबित होते हैं।

भीड़ में नारा "या रसूल अल्लाह" उन्होंने भी लगाया है,

जो तालीमे रसूल ﷺ को सिरे से तर्क करते आ रहे हैं।


और जेसे जाहिल मनाते हैं दिन कोई अपने किसी बड़े का 

ठीक वैसे ही हम विलादते ख़ातमुन नबीय्यीन ﷺ

मना रहे है 


तुम्हारी औरतों के पर्दे कल इन्हीं जुलूसों में चाक होंगे,

क्या औरत नहीं है उम्मती जो दूर रहे जुलूस से?

कल यह फ़तवे आम होंगे,

इसके बिगड़ते रूप को तुम अपनी आँखों से देखोगे,

दीन-ओ-इस्लाम के नाम इन्हीं जुलूसों से बदनाम होंगे।


बनेगा दाग़ कल जो इस्लाम के दामन पर,

आशिक़े रसूल कुछ ऐसे तरीक़े नबी ﷺ के नाम पर ला रहे हैं।


कहीं ऐसा तो नहीं इब्लीस मुसलमान के भेस में आ रहे हैं,

ख़ुशी मनाने के इब्लीसी तरीक़े चुपचाप सिखा रहे हैं।

और आ जाये धोखे में सीधा-सादा उम्मती इसे सुनकर,

जो यह नारे पुरज़ोर लगा रहे है

सिवाए इब्लीस के जहां मे सभी तो खुशियां मना रहे हैं


निसार तेरी चहल-पहल पर हज़ारों ईद-ए-रबीउल अव्वल,

सिवाए इब्लीस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं।

और जैसे जाहिल मनाते हैं दिन कोई अपने किसी बड़े का,

वही जहालत हम ईद-मिलादुन्नबी में ला रहे हैं।

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With fire, with word, with open hand,
The water, the air, or the sand—
what we lost, what we gain
No one knows how we first began.
In lust for life, so far we've gone,

From cave to crown, from dust to throne.
We know so little, so much unknown—
Everything feels like rent, yet we call it our own.

We mapped the stars, we crossed the seas,
Tamed the wild and split the trees.
But in our minds, a darker spark:
We forged a sun to burn the dark.
A breath, a flash — the silence torn,
The gift of God in atoms worn.

And now we stand, both wise and blind,
The end we crafted — cruel, unkind

We made the life in this form
We built the world — we made it home.

No one knows how we first began,
But we ourselves written the end.
To destroy the world may take one fatal fluke—
And Human — that is you — invented Nuke
And Human — that is you — invented Nuke
#zakiansaripoems #zakiansariquotes @lifepoems #bestpoems
वो शख़्स कौन है? .......


वो शख़्स उमर के आख़िरी लम्हों पर हैं
वो शख़्स जो आख़िरी सांसों की दहलीज़ पर है
झुकी हुई पीठ पर टूटते रिश्ते का बोझ लिए
वो शख़्स आज अपनों की ठोकरों पर हैं
उनकी नफ़रत ने शराफत का ख़ून कर दिया
बीवी और बेटे को गरूर ने गुमराह कर दिया
उनकी ज़िद इंसानियत के आख़िरी छोर पर है

आख़िरी सांसों पर अपनेपन का मरहम नहीं,
सांसें तो हैं, मगर इंसान की कोई अहमियत नहीं।
सरताज था जो शख़्स कभी इस दर पर,
आज जैसे बोझ बना हुआ है उसी घर पर।

जिस बेटे के दम पर बदले का दौर चल रहा है,
उस औरत से कोई पूछे - इसका बाप कौन है?
जिसकी कमाई से ये औलाद पली,
जिस की हिम्मत से बड़े इंग्लिश स्कूल में पढी 
वो शख़्स कौन है?

हां, वो बदज़ुबान था, मगर सवाल तो फिर भी है -
लादा था कभी ज़ेवर से जिसने, वो शख़्स कौन है?
तीखी थी ज़ुबान, फिर भी वही बना वजह
जिसके ज़रिए कराई ख़ुदा ने
सैर मक्का-मदीना की, वो शख़्स कौन है?

अमीरी, गरीबी, जैसे-तैसे बच्चों को पाला,
वही तो था शोहर - और कौन है भला?
कोई उस औरत से पूछे
क्या उसने कभी एक पाई भी कमाई?
क्या वो जानती है मज़दूरी क्या होती है?
सिलाई क्या होती है? मेहनत किसे कहते हैं?

क्या वो जानती है बुरे वक़्त में
शोहर का साथ कैसे दिया जाता है?
या उसे बस यही पता है -
के ज़ेवर बिकने पर,
शोहर को कैसे कोसा जाता है?

हाँ, वो बहुत बुरा था, मगर इतनी शराफत तो थी -
उसने कभी उस औरत से मज़दूरी नहीं करवाई।

जो कुछ बेचा ज़रूरत में, सब उसी का तो था,
जैसा भी सही, मगर फ़र्ज़ निभाया तो था।
मिटा कर हस्ती जिसने औलाद को पढाया तो था
वो एक, वही तो था ...
या पूछो उस औरत से - क्या वो शख़्स कोई और है?

सारी उम्मीदें, सारी आस उसी औलाद से जुड़ी थी
जो समझदार ज़ाहिर हुई.
जो आज पढ़ लिख कर
अब कुछ बन कर बाप पर दुश्मन की तरह हावी हुई

हर जुर्म के बाद भी एक रहमत जारी है,
उस शख़्स के सारे गुनाहों पर एक अमल भारी है,
गरीबी आई, मगर बेटे का स्कूल नहीं छुड़वाया 
किताबों के सिवा कोई और बोझ नहीं उठवाया

बदल गया वक़्त तेज़ी से, एक नई शुरुआत हुई
औलाद काबिल हुई तो
उसकी नफ़रत शोहर पर असरदार हुई,

अपने शौहर से हर गाली का,
अब हिसाब माँगने का वक़्त था -
अब उस औरत के बदले का वक़्त था।
उसकी नफ़रत भी अब खुल कर रोशन जहां हुई,
अब वो बेटे के साथ मिल कर ग़ाफ़िल हुई।

वक़्त कुछ इस तरह जवाब दे रहा है
अस्सी साल का बुज़ुर्ग, गुनाहों का हिसाब दे रहा है

शोहर से अलग, वो अमीर बेटे के साथ रहती है।
दोशाला मे लिपटी ज़िल्लत ख़ुशी से उठाती रहती है
शौहर इस उम्र मे अपने कपडे ख़ुद धोता है
वो चहेते बेटे और बहू की ख़िदमत करती रहती हो।

बेटे के घर में बाप के लिए जगह नहीं है
मां वहां खुश है - उसे कोई परवा नहीं है।
मेहमानों के सामने जब घर में बुज़ुर्गी दिखानी होती  है 
बस उसी वक़्त अब उस शौहर की ज़रूरत होती है

नामाये-आमाल में ये कुछ सहारा कर दे,
शायद ये ज़ुल्म उस शख़्स पर,
उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा कर दे।

उसकी बारी पर क़िस्मत उसे मौका क्या देगी?
कल वो औरत अपने गुनाहों का कफ़्फ़ारा क्या देगी?
कल वो औरत अपने गुनाहों का कफ़्फ़ारा क्या देगी?
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सोशल मीडिया की तेज़ी से बढ़ती दुनिया में — जहाँ रील्स, शॉर्ट्स और वायरल क्लिप्स हमारी स्क्रीन पर छाए रहते हैं — एक चुपचाप लेकिन बेहद चिंताजनक समस्या हमारे समाज में जड़ें जमा रही है। यह हमारे घरों में मौज-मस्ती और मासूमियत के नक़ाब में धीरे-धीरे प्रवेश कर चुकी है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम एक पूरी पीढ़ी के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।

यह कोई साधारण बात नहीं है — यह बच्चों के शोषण और दुरुपयोग का एक नया रूप है, जो कि किसी भी सरकार, संस्था या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म द्वारा न तो पहचाना गया है, न ही नियंत्रित किया गया है, मुझे ऐसा लगता है, इस क्षेत्र मे अभी तक नाक़ाफी काम ही हुआ है।

🎥 क्या हो रहा है?
आज लाखों परिवार और कंटेंट क्रिएटर अपने ही बच्चों का उपयोग शर्मनाक रूप से लाइक, शेयर, कमेंट और वायरल होने के लिए कर रहे हैं। शायद यह उस ख़तरनाक सोच का नतीजा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे समाज मे अपनी जड़ें बहुत मज़बूत कर चूका है, एक ऐसी मानसिकता जो शायद आज भी नहीं बदली है, और पेरेंट्स सोचते है कि बच्चे हमारी “मालिकियत” होते हैं — और माता-पिता को पूरा हक़ है कि वे अपने बच्चों को किसी भी समय, किसी भी उद्देश्य से, किसी भी प्रकार की सामग्री में शामिल कर सकते हैं। सोशल मीडिया के दौर मे बड़ी नकटाई, बड़ी बेशर्मी के साथ छोटे बच्चों की मासूमियत का इस्तेमाल क्या जा रहा है।

🚨 हमारे समाज की एक नई शर्मनाक सच्चाई

यह बच्चों के शोषण का सबसे बड़ा, सबसे नया और सबसे ख़तरनाक रूप बन चुका है — और यह सब परिवारों के भीतर हो रहा है, बाहरी लोगों द्वारा नहीं।

सोशल मीडिया कंटेंट बनाना आसान काम नहीं है। बच्चों से बार-बार रील शूट करवाई जाती है, दबाव में प्रदर्शन करवाया जाता है, और कई बार उन्हें रात तक काम करना पड़ता है। चाहे बच्चा थका हुआ हो, परेशान हो या कुछ करने का मन न हो — अगर रील बनानी है, तो प्रदर्शन करना ही पड़ेगा, बेहिस बन कर माँ — बाप, भाई बहन घर के छोटे बच्चों को अपने कंटेंट के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

यह हमारे समाज की शर्मनाक हकीकत है:
बच्चों की मासूमियत और क्यूटनेस को “वायरल पहुंच” के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इन बच्चों को एक्टिंग, डांस, रोना, हँसना, और कैमरे के सामने “क्यूट” दिखने के लिए मजबूर किया जाता है — सब कुछ सिर्फ व्यूज़, लाइक्स और पैसे के लिए, कुछ लोग सोशल मीडिया के दौर मे इस क़दर घटियापन तक पहुंच गए हैं की अपने बच्चों की घरेलु ज़िंदगी भी रील्स और शार्ट मे शेयर करते है, सिर्फ इस लालच से की शायद यह वायरल हो जाए और उनकी कमाई का एक रास्ता और खुल जाये।

कुछ बच्चे शायद इसका आनंद लेते दिखते हैं, लेकिन कई बार बच्चों पर ज़बरदस्ती की जाती है। पर्दे के पीछे तनाव, बार-बार टेक, लालच, भावनात्मक दबाव और कई बार डाँट-फटकार भी शामिल होती है, हम सब को सिर्फ वो नज़र आता है जो स्क्रीन पर है, स्क्रीन की चमक हमारी आखों पर एक ऐसी पट्टी बांध देती है की उसके पीछे ज़ुल्म और शोषण की जो गन्दगी है, वो हमें दिखाई ही नहीं देती।

साफ़-साफ़ कहें — यह बच्चों का शोषण है। और यह सब दिन के उजाले में हो रहा है।

🧠 मानसिक प्रभाव

प्राइवेसी का नुकसान: बच्चे अपनी निजी सीमाओं के बिना बड़े हो रहे हैं। उनके सबसे निजी क्षण लाखों लोगों के सामने होते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर: लगातार प्रदर्शन का दबाव, आलोचना और ध्यान की ज़रूरत से बच्चे चिंता, पहचान संकट या डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं, छोटी सी उम्र मे कुछ बच्चे हिन् भावना का शिकार हो सकते है तो कुछ अपने आप को बहुत अलग होने की भावना से ग्रसित हो सकते है, इस तरह के हजारों दबाव में उनकी परवरिश उनकी मानसिकता को कैसे डेवलप करेगी हमें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है।

डिजिटल छवि का खतरा: आज बनाए गए वीडियो बच्चे की पूरी जिंदगी पीछा कर सकते हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया जितना सुखद दिखता है, उससे कई ज़ियादा दुःख यह ज़िन्दगी मे दे सकता है, कमान से छूटा हुआ तीर, बंदूक से निकली गोली और इंसान के अल्फ़ाज़ जिस तरह एक बार निकलने के बाद रिवर्स नहीं होते उसी तरह इंटरनेट सोशल मीडिया पर डाली हुई चीज़ रिवर्स नहीं की जा सकती, उन्हें कोई नियंत्रण नहीं है, फिर भी उनका चेहरा और पहचान इंटरनेट पर हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है।

💰 पैसे का क्या? असली फ़ायदा किसे हो रहा है?

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस मासूमियत के पीछे छुपा हुआ आर्थिक शोषण।

लाखों परिवार और कंटेंट क्रिएटर ऐसे वीडियो के ज़रिए अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं जो सिर्फ़ बच्चों की वजह से वायरल हो जाते हैं। प्रायोजित कंटेंट से लेकर ब्रांड डील और YouTube से कमाई तक — बच्चों पर केंद्रित कंटेंट पैसे कमाने का एक बड़ा ज़रिया है।

बच्चों की परवरिश, उनकी ज़रूरते पूरी करना माँ बाप की ज़िम्मेदारी होती है, लेकिन यह बेहद अफ़सोस की बात है, बहुत घिनौनी हरकत है की कंटेंट मे बच्चों का इस्तेमाल हो रहा है और लाखों बच्चे माँ बाप को पाल रहे हैं, बच्चे माँ बाप की कमाई का ज़रिया बने हुए है।

लेकिन समस्या यह है:

सारी कमाई माता-पिता या कंटेंट क्रिएटर के अकाउंट में जाती है।

कोई कानून नहीं है जो तय करे कि बच्चे को उसका हिस्सा मिले

ज़्यादातर बच्चों को यह भी नहीं पता कि उन्हें “कमाई” का ज़रिया बनाया गया है

फिल्म इंडस्ट्री में बच्चों के लिए ट्रस्ट फंड और कार्य घंटों की सीमा होती है — लेकिन सोशल मीडिया में सब कुछ बेलगाम है

अगर यह बिना रोक-टोक जारी रहा, तो हम न केवल भावनात्मक नुकसान देखेंगे — बल्कि एक लाइव आर्थिक शोषण भी।

⚖️ कानून कहाँ हैं?

जब कि पारंपरिक फिल्म और टेलीविजन उद्योगों में बाल कलाकारों के उपयोग के लिए सख्त नियम हैं — जिसमें काम के घंटे, वेतन और मनोवैज्ञानिक देखभाल शामिल हैं — सोशल मीडिया सामग्री के लिए ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है।

  • फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में बच्चों के लिए सख्त नियम हैं — लेकिन सोशल मीडिया में कुछ भी नहीं
  • इस बात पर कोई कानूनी सीमा नहीं है कि कोई बालक या बालिका कितनी बार रीलों में दिखाई दे सकते है।
  • बच्चे से किसी सहमति प्रोटोकॉल की आवश्यकता नहीं है।
  • कोई सरकारी निगरानी नहीं,कोई भी प्राधिकरण या एजेंसी ऐसे उपयोग की निगरानी या लाइसेंस नहीं देती है।
  • कोई आय-संरक्षण व्यवस्था नहीं

यह एक कानूनी शून्य है — जो बच्चों को नुकसान पहुँचा रहा है,यह खामी बच्चों को ऑनलाइन अप्रतिबंधित और संभावित रूप से हानिकारक उपयोग की अनुमति देती है।

🚨 यह इतना जरूरी क्यों है?

आज लाखों रुपये बच्चों की वजह से वायरल कंटेंट से कमाए जा रहे हैं — लेकिन:

कई परिवार और कंटेंट क्रिएटर वायरल कंटेंट से लाखों की कमाई कर रहे हैं, जो उनमें शामिल बच्चों की वजह से लोकप्रिय हो जाता है।

फिर भी, इस पैसे को बच्चे के साथ साझा करने या उनके भविष्य के लिए सुरक्षित करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

ज़्यादातर मामलों में, पूरी आय माता-पिता या क्रिएटर के खाते में जाती है, और इसमें कोई पारदर्शिता या सुरक्षा उपाय नहीं होते।

डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में इन बच्चों को किसी भी मौजूदा बाल श्रम या आय कानून द्वारा संरक्षित नहीं किया जाता है।

उनके श्रम, भावनाओं, छवि और पहचान का मुद्रीकरण किया जा रहा है — लेकिन उनके अधिकारों को मान्यता नहीं दी जा रही है।

फिल्मांकन के घंटों की कोई सीमा नहीं है, सहमति की कोई जाँच नहीं है, और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है।

बच्चों की मेहनत, भावनाएँ और पहचान — सबका दोहन हो रहा है। लेकिन उनके अधिकारों की कोई बात नहीं कर रहा।

🛑 अब क्या बदलाव जरूरी हैं?

मैं सरकारों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और बाल अधिकार संगठनों से निवेदन करता हूँ:

हमारी सरकारों और प्लेटफ़ॉर्म्स को क्यों कार्रवाई करनी चाहिए
हालांकि कई देशों में बाल श्रम से जुड़े सख्त कानून हैं, लेकिन डिजिटल क्षेत्र अभी भी काफी हद तक अनियमित है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म नैतिकता से ज़्यादा जुड़ाव को प्राथमिकता देते हैं। सरकारों ने शायद अभी तक इस आधुनिक शोषण से निपटने के लिए कोई स्पष्ट नीतियाँ नहीं बनाई हैं।

✅ प्रमुख सिफारिशें:

  • न्यूनतम आयु सीमा: 13 या 14 साल से कम उम्र के बच्चों को बिना कानूनी अनुमति के मोनेटाइज्ड कंटेंट में न शामिल किया जाए
  • अनिवार्य अनुमति प्रणाली: कंटेंट क्रिएटर्स को बाल कलाकार कानूनों जैसे परमिट लेने अनिवार्य हों
  • कमाई का ट्रस्ट फंड: बच्चे के भविष्य के लिए आय का एक निश्चित प्रतिशत ट्रस्ट खाते में जमा करना अनिवार्य हों। बच्चों की आय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी वित्तीय सुरक्षा उपाय
  • डिजिटल निगरानी प्राधिकरण: एक डिजिटल बाल सुरक्षा संस्था बनाई जाए जो ऑनलाइन बाल शोषण से संबंधित शिकायतों की समीक्षा, विनियमन और कार्रवाई कर सके।
  • अभिभावक के लिए जागरूकता अभियान: बच्चों की सहमति, अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य पर शिक्षा दी जाए
  • सख्त दंड: बच्चों के शोषण पर भारी जुर्माना और सोशल मीडिया प्रतिबंध लगाए जाएँ

📣 भविष्य के लिए चेतावनी

अगर इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह प्रवृत्ति अगले 10 से 15 सालों में लाखों बच्चों की ज़िंदगी को चुपचाप बर्बाद कर सकती है। और इंटरनेट — हमारी यादों के उलट — कभी नहीं भूलता।

इंटरनेट कभी नहीं भूलता। आज जो “मासूम मज़ा” लगता है, वही बड़े होने पर उन बच्चों के लिए गहरी शर्म, उलझन या आघात का कारण बन सकता है। हम नहीं जानते कि एक बच्चा — किशोर या वयस्क होने पर — कैसा महसूस करेगा या करेगी, जब वह उन रीलों या शॉर्ट्स को देखे जिनमें उसे कैमरे के सामने अभिनय, नृत्य या प्रदर्शन करने के लिए मजबूर किया गया था। या फिर वायरल के लालच मे उस बच्चे से ऐसी हरकते करवाई गई जो आज शायद उसके लिए शर्मिंदगी की बात हो,
कुछ के लिए, यह हानिरहित हो सकता है। दूसरों के लिए, यह अवसाद, आक्रोश या पहचान की खंडित भावना को जन्म दे सकता है।

बच्चों को नहीं पता कि भविष्य में जब वे बड़े होंगे, तब इन रील्स को देखकर वे कैसा महसूस करेंगे। शायद कुछ को कोई फर्क न पड़े — लेकिन बहुतों को यह एहसास हो सकता है कि उनके माता-पिता ने उनके बचपन का इस्तेमाल पैसा कमाने और लाइक्स बटोरने के लिए किया

कल्पना कीजिए कि आप बड़े हो रहे हैं और आपको एहसास हो रहा है कि आपके अपने माता-पिता ने आपके बचपन का इस्तेमाल — आपके चेहरे, आपकी आवाज़, आपकी भावनाओं का — लाइक्स, ध्यान और पैसा कमाने के लिए एक साधन के रूप में किया। यह एहसास क्रोध, अविश्वास या स्थायी मनोवैज्ञानिक घाव पैदा कर सकता है।

यह सिर्फ पालन-पोषण की गलती नहीं — यह एक गहराता हुआ सामाजिक और कानूनी संकट है।

हम अभी शुरुआती संकेत देख रहे हैं। लेकिन अगर हम चुप रहे, तो हम एक ऐसी पीढ़ी को जन्म देने का जोखिम उठा रहे हैं जो ख़ुद को इस्तेमाल किया हुआ, अनदेखा और भावनात्मक रूप से परित्यक्त महसूस करेगी — और यह सब वायरल क्लिप्स के लिए।

शायद आज भी चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं। शायद आज हम सुरक्षा-व्यवस्था बना सकें। लेकिन कल बहुत देर हो सकती है।
मैं किसी को डराने या नाटकीय होने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ — मैं ईमानदार होने की कोशिश कर रहा हूँ। अगर हम अभी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो मुझे लगता है कि निकट भविष्य में इस अनियंत्रित डिजिटल वातावरण में पले-बढ़े युवाओं में सामाजिक अलगाव, चिंता, अवसाद और यहाँ तक कि आत्म-क्षति भी बढ़ेगी। और कही न कही इसके ज़िम्मेदार हम सब लोग है जो की आज चुप हैं और बल्कि चुप ही नहीं है मज़े के साथ इस शोषण का आनंद ले रहे है।

✊ अब रुकने का नहीं, बोलने का समय है

आइए हम सब मिलकर एक सुरक्षित भविष्य बनाएँ। आइए बचपन की रक्षा करें — ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों जगह।

बचपन बिकाऊ नहीं है। बच्चे केवल कंटेंट नहीं हैं।

✍️ कार्रवाई करें: बच्चों की सुरक्षा के लिए पेटीशन पर साइन करें

अगर आप इस मुद्दे से चिंतित हैं — एक माता-पिता, शिक्षक, नीति निर्माता या एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में — तो कृपया आवाज़ उठाइए।

👇 अभी इस पेटीशन पर साइन कीजिए:

👉 इस लिंक पर क्लिक करें और साइन करें

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