उम्मते मुस्लिमा थी जो कभी,
अब कोई देवबंदी, कोई ब्रेलवी, कोई अहले हदीस हो गया
रुसवाई और ज़िल्लत मुक़द्दर है बिखरी हुई क़ौम का
और हर फ़िरक़े को यह खुशफ़हमी, जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया
जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया

तीन सो तेरह थे बदर मे , जैसे एक जिस्म एक जान थे
सहाबी हुए किसी के, अहले बेत किसी के,
सुन्नते रसूल का भी, अब बटवारा हो गया
क़िब्ला तो वही एक है सबका,
और एक दुसरे के लिए, मुसलमां इस्लाम से ख़ारिज हो गया ,
हर फ़िरक़े को यह खुशफ़हमी, जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया,

उम्मते मुस्लिमा थी जो कभी,
अब कोई देवबंदी, कोई ब्रेलवी, कोई अहले हदीस हो गया
रुसवाई और ज़िल्लत मुक़द्दर है बिखरी हुई क़ौम का
और हर फ़िरक़े को यह खुशफ़हमी, 

जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया
जन्नत पर हमारा कब्ज़ा हो गया


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मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं 
बड़ी ज़रूरत है वसीलों की ज़माने को 
गर मिल जाए कोई बुजुर्ग तो एक दरगाह खोल लूं


तबर्रुक, सिन्नी, ग़िलाफ़ फूल कई काम चल जायेगें
जितने हैं बेरोज़गार ख़ानदान मे, सब रोज़ी से लग जायेगें
टीले वाले मज़ार पर, चढा के चादर मांगी यही इक दुआ
मिल जाए जगह कुशादा आप जेसी,
तो मे भी एक दरगाह खोल लूं
मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं


करामातों की सच्ची एक, क़िताब छपवा दूंगा
बच्चा देते 40 दिन मे, पर्चे बटवा दूंगा
500 वाली चादर तुमको रोज़ी भी दिलवाएगी
गर चढ़ा दो 2000 की, जन्नत भी मिल जाएगी
वक़्त हो चाहे जितना तेढा, बाबा पार लगाते बेढा
अच्छे अच्छे कुछ एसे कलीमात सोच लूं
मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं


भूत प्रेत आसाब असर , सब का इलाज इधर है
जिन्नातों का भी, पक्का जुगाड इधर है,


पढेंगे नाते राग अलाप के, मस्त माहोल बन जायेगा,
हाज़री वाले क़व्वालों का, स्टेज इधर सज जायेगा,


अब बडा के दाढी मे भी ख़ादिम वाला, चोला ओढ लूं 
बड़ी ज़रूरत है, वसीलों की ज़माने को, 
अब में भी एक दरगाह खोल लूं.
मंदे हैं धंधे सारे, सोच रहा हूं कोई नया काम खोल लूं 


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वही करेगा फ़ैसला और वही देगा अब दलील

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील


गिरफ़्त करने से पहले वो इशारे हज़ार देता है,

सुधर जा अगर सुधर सके, ख़ामोशी से कहता है।

मगर जब ज़ुल्म हद से गुज़र जाए,

करता है ज़ालिम को ज़लील।

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील,

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील।


यह लंबी है लड़ाई, अब आख़िरत तक जाना है, 

वो दुनिया की अदालतों की सोचे बैठे हैं। 

हमें तो अब अपने रब की अदालत तक जाना है। 


हमने उसकी रज़ा पर छोड़ा है अपना मुक़दमा, 

वही करेगा फ़ैसला और वही देगा अब दलील

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील, 

हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील।


वो है मुहाफ़िज़ मेरा, फिर किसी का ख़ौफ़ नहीं
उसके आगे ताक़तवर कोई फ़िरौन नहीं

मेरे सब्र की एक वही है दलील,
हर भरोसे की है , वही एक तकमील,
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील

सजदे में सर के साथ, फ़िक्रें भी मैंने रख दीं,
हर बेचैनी अपनी , उसकी बारगाह में रख दी
मुझे दुनिया की दिलजोही से क्या लेना
हर उम्मीद आख़िरत में उसकी रज़ा पर रख दी

वही तो मालिक है उस दिन का,
वही मुन्सिफ़ क़यामत में, वही तो है वकील
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील
हसबुनल्लाहु वा नेमल वकील


From silver birch forests to lakes that mirror the skies

Russia’s beauty unfolds, wherever look wandering eyes.

Its women shine with grace, like dawn’s first soft light
Its men stand strong, as pines, enduring through the night.

The white beauty, of the Russian winter, peaceful and bright
Russia wears, a snowy crown of shimmering
shimmering crystal light.
snowy crown, of shimmering crystal light.

Summer spreads its, golden sunshine, across the fields so wide
While rivers, woods, and meadows glow with nature’s pride.

Autumn paints the forests rich with amber, red, and gold
with amber, red, and gold.

Where every breeze carries a story centuries old.
a story centuries old.

Beyond its culture and charms divine
A taste of history, in every dish we find.

Russia holds, a world of flavors, deep inside
Delicious cuisine, adds another charm to its pride.

Pelmeni
Pelmeni warm the heart and bring joy to the soul
While breakfast, Syrniki make mornings whole.

When sorrow visits, and your spirit feels blue
The flavor of Bi’lini brings, comfort and sunshine through.

A glass of Ku’vass , sings like an old village song
old village song
Its taste lingers gently, in memories for long.
Whenever it’s served, you never miss the chance
A colorful Russian salad, makes your appetite dance.

Russia is a hidden gem, a land to cherish and to love
A gift of endless beauty, like blessings from above.

From silver birch forests to lakes that mirror the skies
Russia’s beauty unfolds, wherever look wandering eyes.

Its women shine with grace, like dawn’s first soft light
Its men stand strong, as pines, enduring through the night.

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 जब मर्द बिरयानी के बदले औरत के जिस्म की ललक रखे,

और डॉक्टर लाशों पर हँसना सीख जाएँ।

तो समझ लो फसल वही है, बीज हमने बोए थे।


₹370 की बिरयानी, और बदले में वसूली चाहिए

थोड़े से सिक्के, और औरत के जिस्म पर क़ब्ज़ा चाहिए


बाहर वाले ख़ुद को जैसे-तैसे बचा ही लेंगे

पर इस सोच के मर्द से उसी के घर की औरतों को डरना चाहिए


फरिश्ता समझते हैं उन्हें जिन्हें ज़मीं पर 'डॉक्टर' कहते हैं

कम से कम अपने पेशे की तो इज़्ज़त करनी चाहिए


मुर्दों के आज़ा देखकर हँसते हैं जो लाश पर

मिल जाए कहीं तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए


और कब तक उठाए फिरेंगे बोझ तमीज़ और तहज़ीब का ?

नए ज़माने में तो कुछ बदअख़्लाक़ी भी 'नई ' चाहिए


उरियानी सड़क पर, बेहयाई ज़बान मे, फाहशी सोच मे 

क्या वाक़ई यही तरक़्क़ी है जिसे हमें अपनाना चाहिए? 


हम ने खुद उड़ा दी मज़ाक मे वो बात, जो मज़ाक नहीं थी 

केसी हो तरबियत बच्चो की हमें फिर से सोचना चाहिए


और जो फसल उग रही है, बस उसी का तो क़ुसूर नहीं है,

बीज किसने बोए थे, यह सवाल भी होना चाहिए।


कठघरे में सिर्फ़ गुनहगार नहीं, मुआशरा भी खड़ा है,

उजड़े गर बाग़ तो....

कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए।

हाँ, कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए

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 "मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

ग़दीर-ए-ख़ुम में जो गूंजा था क़ौल-ए-मुस्तफ़ा

वो ऐलान-ए-मोहब्बत ही काफ़ी है

अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है


"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

फ़हाज़ा अली उन मौला"


हिजरत की रात जान हथेली पर रख कर

सो गए रसूल अल्लाह के बिस्तर पर

वफ़ा का ये अंदाज़ ही काफी है

अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है


"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

फ़हाज़ा अली उन मौला"


जो हुआ ख़ैबर के मौके पर मौजिज़ा

रोज़ कहा हुआ करते हैं

रसूल अल्लाह ने फ़रमाया

"कल अलम दूंगा हाथ में उसके

अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं"


सुबह हुई तो नाम-ए-अली रोशन हुआ

अलम अली के हाथों में ज़ाहिर हुआ

कौन है अली ये बताने को

ख़ैबर का वो मंज़र ही काफ़ी है

अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है


"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"

फ़हाज़ा अली उन मौला"


"मन कुंतो मौला"

"फ़हाज़ा अली उन मौला"

04/ june/2026

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 क़ाला रसूलुल्लाह ﷺ :
“इन्नी उरीतु फ़ी मनामी, का-अन्ना बनी हकम इब्नि अबी अल-आस,
यनज़ूना अला मिनबरी, कमा तनज़ू अल-क़िरदह।”

मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

शाम से चली थी एक ज़ुल्म की आँधी
मदीने की फ़िज़ाओं पर ख़ौफ़ के बादल ठहर आए

हालात थे इस क़दर, गर्द में लिपटे हुए
गुज़रते लम्हे, आने वाले वक़्त को न पढ़ पाए
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”
फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”

न जाने क्यों तारीख़ ने कम लिखा वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा

कुछ ऐसे भी सच है, हम जिससे वाक़िफ़ हो पाए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

बहा ख़ून कर्बला मे, आलम ए इस्लाम को, सुर्ख़ कर गया
जो ज़िंदा था ज़मीर से, वो बैअत-ए-जबर से फिर गया
ज़ालिमों को, इश्क़-ए-अहल-ए-बैत गवारा न हुआ,
सो कुचलने को, आल-ए-रसूल की मोहब्बत,
एक लश्कर, मदीने की जानिब रवाना हुआ,

फिर से एक बार, कर्बला का मंज़र दोहराया गया,
नबी के शहर को ख़ून से नहलाया गया,

मासूम बेटियों के रुख़सार से हिजाब छीना गया.
पाक ख़ातूनों की हुरमत को भी लूटा गया

मिम्बरे रसूल पर बांधे गए ग़लीच घोड़े
मस्जिद ऐ नबवी की, अज़मत को टापों तले रौंदा गया ,

सहमे हुए थे, दर-ओ-दीवार शहर-ए-तय्यबा के,
मातम में डूबे हुए थे, घर अंसार के,
अज़ाँ भी रो के पढ़ी जाती थी, उन दिनों शायद,
नमाज़ों में भी छलक उठते थे, अश्क दर्द के ,

सदियों यह शहर इस ज़ख्म से उभरा नहीं, 
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं,
बाद उसके आप मुस्कुराए नहीं ,

दो गवाह काफी होते हैं, जुर्म साबित करने को.
फिर भी लोग बेचैन हैं, उसे रज़ी अल्लाह कहने को,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
तारीख मे ज़िंदा, दूसरा गवाह है वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा

मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे,
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
यह दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के, 
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं

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दादा लड़ा था नाना से,
बाप लड़ा था वालिद से।

पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।
पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।

पहुँची थी अपने उरूज पर कर्बला में दुश्मनी,
जो शुरू हुई मक्का में रसूलुल्लाह की विलादत से।

गर तलाश हो हक़ की, तो सच को समझना पड़ेगा,
तारीख़ को सिर्फ़ जंग नहीं, इंसाफ़ से पढ़ना पड़ेगा।

मजबूरी थी फ़त्ह-ए-मक्का,
न करते क़ुबूल दावत, तो क्या करते?
आ गए साये में इस्लाम के,पढ़ा कलिमा डरते-डरते।

वक़्त-ब-वक़्त साया-ए-तकरार बढ़ता गया,
नस्ल-दर-नस्ल ईमान का पैमाना घटता गया।

आते-आते तीसरी नस्ल, ख़ून तक़रीबन काफ़िर हो गया।
शाम के बादशाह का बेटा, क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।
क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।

जो मिटाने चले थे अहल-ए-बैत को,
अपनी नस्ल पर दाग़ लगा बैठे।
कर्बला में लगाई आग,
और ख़ानदान अपना जला बैठे।

वो मर के मलऊन हो गया, मुआविया का लख़्त-ए-जिगर।
अली के चिराग़ आज भी रोशन हैं, आँधियों से बेफ़िक्र।

तन से जुदा होकर भी रहा बुलंद, नेज़ों पर सर जिसका।
वो हुसैन हैं।
वो कभी हारे नहीं,
कर्बला में बस जीते ही हुसैन हैं।

हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।
हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।

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