जब मर्द बिरयानी के बदले औरत के जिस्म की ललक रखे,
और डॉक्टर लाशों पर हँसना सीख जाएँ।
तो समझ लो फसल वही है, बीज हमने बोए थे।
₹370 की बिरयानी, और बदले में वसूली चाहिए
थोड़े से सिक्के, और औरत के जिस्म पर क़ब्ज़ा चाहिए
बाहर वाले ख़ुद को जैसे-तैसे बचा ही लेंगे
पर इस सोच के मर्द से उसी के घर की औरतों को डरना चाहिए
फरिश्ता समझते हैं उन्हें जिन्हें ज़मीं पर 'डॉक्टर' कहते हैं
कम से कम अपने पेशे की तो इज़्ज़त करनी चाहिए
मुर्दों के आज़ा देखकर हँसते हैं जो लाश पर
मिल जाए कहीं तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए
और कब तक उठाए फिरेंगे बोझ तमीज़ और तहज़ीब का ?
नए ज़माने में तो कुछ बदअख़्लाक़ी भी 'नई ' चाहिए
उरियानी सड़क पर, बेहयाई ज़बान मे, फाहशी सोच मे
क्या वाक़ई यही तरक़्क़ी है जिसे हमें अपनाना चाहिए?
हम ने खुद उड़ा दी मज़ाक मे वो बात, जो मज़ाक नहीं थी
केसी हो तरबियत बच्चो की हमें फिर से सोचना चाहिए
और जो फसल उग रही है, बस उसी का तो क़ुसूर नहीं है,
बीज किसने बोए थे, यह सवाल भी होना चाहिए।
कठघरे में सिर्फ़ गुनहगार नहीं, मुआशरा भी खड़ा है,
उजड़े गर बाग़ तो....
कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए।
हाँ, कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए
#zakiansaripoem #379kibiryani #hidipoem #urdupoetry
"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"
ग़दीर-ए-ख़ुम में जो गूंजा था क़ौल-ए-मुस्तफ़ा
वो ऐलान-ए-मोहब्बत ही काफ़ी है
अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है
"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"
फ़हाज़ा अली उन मौला"
हिजरत की रात जान हथेली पर रख कर
सो गए रसूल अल्लाह के बिस्तर पर
वफ़ा का ये अंदाज़ ही काफी है
अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है
"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"
फ़हाज़ा अली उन मौला"
जो हुआ ख़ैबर के मौके पर मौजिज़ा
रोज़ कहा हुआ करते हैं
रसूल अल्लाह ने फ़रमाया
"कल अलम दूंगा हाथ में उसके
अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं"
सुबह हुई तो नाम-ए-अली रोशन हुआ
अलम अली के हाथों में ज़ाहिर हुआ
कौन है अली ये बताने को
ख़ैबर का वो मंज़र ही काफ़ी है
अली की फज़ीलत के लिए, बस एक हदीस काफ़ी है
"मन कुंतो मौला, फ़हाज़ा अली उन मौला"
फ़हाज़ा अली उन मौला"
"मन कुंतो मौला"
"फ़हाज़ा अली उन मौला"
04/ june/2026
#ghadeerkhum #molaali #ali #islamicpoetry #islamic #muslim #urdupoetry #urdunazm #manqabt #islamichistory
क़ाला रसूलुल्लाह ﷺ :
“इन्नी उरीतु फ़ी मनामी, का-अन्ना बनी हकम इब्नि अबी अल-आस,
यनज़ूना अला मिनबरी, कमा तनज़ू अल-क़िरदह।”
मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
शाम से चली थी एक ज़ुल्म की आँधी
मदीने की फ़िज़ाओं पर ख़ौफ़ के बादल ठहर आए
हालात थे इस क़दर, गर्द में लिपटे हुए
गुज़रते लम्हे, आने वाले वक़्त को न पढ़ पाए
ये दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”
फ़ी सनति थलासीन व सित्तीन लिल-हिज्रह”
न जाने क्यों तारीख़ ने कम लिखा वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा
कुछ ऐसे भी सच है, हम जिससे वाक़िफ़ हो पाए नहीं
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बहा ख़ून कर्बला मे, आलम ए इस्लाम को, सुर्ख़ कर गया
ज़ालिमों को, इश्क़-ए-अहल-ए-बैत गवारा न हुआ,
सो कुचलने को, आल-ए-रसूल की मोहब्बत,
एक लश्कर, मदीने की जानिब रवाना हुआ,
फिर से एक बार, कर्बला का मंज़र दोहराया गया,
नबी के शहर को ख़ून से नहलाया गया,
मासूम बेटियों के रुख़सार से हिजाब छीना गया.
पाक ख़ातूनों की हुरमत को भी लूटा गया
मिम्बरे रसूल पर बांधे गए ग़लीच घोड़े
मस्जिद ऐ नबवी की, अज़मत को टापों तले रौंदा गया ,
सहमे हुए थे, दर-ओ-दीवार शहर-ए-तय्यबा के,
अज़ाँ भी रो के पढ़ी जाती थी, उन दिनों शायद,
नमाज़ों में भी छलक उठते थे, अश्क दर्द के ,
सदियों यह शहर इस ज़ख्म से उभरा नहीं,
बाद उसके आप मुस्कुराए नहीं ,
दो गवाह काफी होते हैं, जुर्म साबित करने को.
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
कर्बला के बाद, यज़ीद के ख़िलाफ़,
तारीख मे ज़िंदा, दूसरा गवाह है वाक़िया-ए-हर्रा
ज़ुल्म से थर्रा रहा था मदीने का ज़र्रा ज़र्रा
मरवान के बंदर मिम्बर पर उछलते नज़र आए थे,
जो देखा रसूल अल्लाह ने, किसी और ने देखा नहीं
यह दर्द था दिल में रसूले ख़ुदा के,
देखा एक ख़्वाब, बाद उसके आप, मुस्कुराए नहीं
बाप लड़ा था वालिद से।
पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।
पुरानी थी नफ़रत मलऊन यज़ीद की हुसैन से ।
पहुँची थी अपने उरूज पर कर्बला में दुश्मनी,
जो शुरू हुई मक्का में रसूलुल्लाह की विलादत से।
गर तलाश हो हक़ की, तो सच को समझना पड़ेगा,
तारीख़ को सिर्फ़ जंग नहीं, इंसाफ़ से पढ़ना पड़ेगा।
मजबूरी थी फ़त्ह-ए-मक्का,
न करते क़ुबूल दावत, तो क्या करते?
आ गए साये में इस्लाम के,पढ़ा कलिमा डरते-डरते।
वक़्त-ब-वक़्त साया-ए-तकरार बढ़ता गया,
नस्ल-दर-नस्ल ईमान का पैमाना घटता गया।
आते-आते तीसरी नस्ल, ख़ून तक़रीबन काफ़िर हो गया।
शाम के बादशाह का बेटा, क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।
क़ातिल-ए-हुसैन हो गया।
जो मिटाने चले थे अहल-ए-बैत को,
अपनी नस्ल पर दाग़ लगा बैठे।
कर्बला में लगाई आग,
और ख़ानदान अपना जला बैठे।
वो मर के मलऊन हो गया, मुआविया का लख़्त-ए-जिगर।
अली के चिराग़ आज भी रोशन हैं, आँधियों से बेफ़िक्र।
तन से जुदा होकर भी रहा बुलंद, नेज़ों पर सर जिसका।
वो हुसैन हैं।
वो कभी हारे नहीं,
कर्बला में बस जीते ही हुसैन हैं।
हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।
हर मोमिन के सीने में, आज भी ज़िंदा हुसैन हैं।
#qarbalakikahani #urdupoem #zakiahskim #urdukahani #shaeri #shayeri #qarbalakijung
#qarbalakikahani #urdupoem #zakiahskim #urdukahani #shaeri #shayeri #qarbalakijung
आओ कुछ नए अंदाज़ मे ईद मनाएँ
ईद के लिए ख़ुद को कुछ ऐसे सजाएँ
ना सिर्फ़ धागों से बुना हो नया लिबास,
ना इसमें दिखावे का हो कोई एहसास,
शफ़क़्क़त से तैयार हुआ ऐसा जोड़ा
जो दे नरमी का इक अंदाज़-ए-ख़ास
अपनेपन का इत्र कुछ यूँ लगाएँ,
मोहब्बत की महक से ख़ुद को महकाएँ,
तक़सीम करें इसे दिल खोल कर यूँ,
ख़ुशनुमा हो जाएँ ज़माने की सारी फ़िज़ाएँ 🌙
हमारा अंदाज़-ए-बयां यूँ ही रहे ख़ास,
लहजा हो जैसे एक शिफ़ा, नरम हों अल्फ़ाज़।
ज़ुबां पर रहे मिठास शीर की हर बात में,
शीरीन रहे ईद का लज़ीज़ मिजाज़ ✨
अहंकार, ग़ुस्सा और ग़ुरूर की ऊँचाई,
दूर रहे अहम् और मैं की परछाई
किना और रंजिश से रूह को आज़ाद करो
जो अपने है दिल से उनकी क़द्र करो ✨
बना दो यादगार हर लम्हे को
ख़ूबसूरत यादों के तोहफे बांटों
दोस्तों और रिश्तेदारों को
अमन और मुहब्बत की मिसाल बनाएं
आओ कुछ नए अंदाज़ मे ईद मनाएँ
#EidMubarak2026 #EidPoetry #UrduShayari #EidUlFitr #ZakiAshkim #PeaceAndLove #Eid2026 #IslamicPoetry #HeartHealingPoem
But when the red shade of your lipstick
matches your dress,
it creates unmatched grace.
That shade rests like a soft shadow on your lips,
protecting them when the harsh wind tries to kiss.
Gentle, moist petals, charm of your pretty face
in your beauty it adds another grace
A glow words fail to describe
your tender lips, a natural vibe.
I hate anything that comes between;
I love to breathe the aroma of your skin.
When my breath drinks the nectar of your lips,
That shade becomes a barrier between our kiss.
That’s my only complaint about your lipstick.
But when the red shade matches your dress,
it creates unmatched grace.
Sometimes I feel the lipstick is so lucky,
it drinks the dew of your lips, where I long to be.
Most of the time on your lips it stays,
and in me, a soft jealousy it creates.
Sometimes I wish I were that red shade—
Each moment I would kiss your lips, unafraid.
Just thinking of it drives me mad.
On your moist lips, the shade of red
when it matches your dress,
it creates unmatched grace.
निसार तेरी चहल-पहल पर हज़ारों ईद-ए-रबीउल अव्वल,
सिवाए इब्लीस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं।
कमज़ोर था इस्लाम इतना जो न सिखा सका तरीक़ा ख़ुशी मनाने का,
हम जुलूस की हिदायत नसरानियों से सीख कर आ रहे हैं।
और जैसे जाहिल मनाते हैं दिन कोई अपने किसी बड़े का,
वही जहालत हम ईद-मिलादुन्नबी में ला रहे हैं।
हमने भी कर ली है भीड़ इकट्ठी, हमारे हुजूम गलियों में नारे लगा रहे हैं,
अभी तो सिर्फ़ डीजे बजे हैं, कल ख़ुशी में सड़कों पर खुले नाच होंगे।
हम ख़ुशी मनाने के तरीक़े जाहिलों से सीख कर आ रहे हैं।
फ़ज्र तर्क हुई जुलूस की तैयारी में,
ज़ोहर थकान ने अदा न करने दी।
यूँ तो हज़ारों थे मुसलमान जुलूस की भीड़ में,
मोमिन को छोड़ कर सब नमाज़ से मुँह मोड़ कर जा रहे हैं।
इस तरह सिवाए इब्लीस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं।
शिरकत करे जो जुलूस में वही असली मुसलमान होते हैं,
डेक पर बजती नातों से मोहब्बत के दावे साबित होते हैं।
भीड़ में नारा "या रसूल अल्लाह" उन्होंने भी लगाया है,
जो तालीमे रसूल ﷺ को सिरे से तर्क करते आ रहे हैं।
और जेसे जाहिल मनाते हैं दिन कोई अपने किसी बड़े का
ठीक वैसे ही हम विलादते ख़ातमुन नबीय्यीन ﷺ
मना रहे है
तुम्हारी औरतों के पर्दे कल इन्हीं जुलूसों में चाक होंगे,
क्या औरत नहीं है उम्मती जो दूर रहे जुलूस से?
कल यह फ़तवे आम होंगे,
इसके बिगड़ते रूप को तुम अपनी आँखों से देखोगे,
दीन-ओ-इस्लाम के नाम इन्हीं जुलूसों से बदनाम होंगे।
बनेगा दाग़ कल जो इस्लाम के दामन पर,
आशिक़े रसूल कुछ ऐसे तरीक़े नबी ﷺ के नाम पर ला रहे हैं।
कहीं ऐसा तो नहीं इब्लीस मुसलमान के भेस में आ रहे हैं,
ख़ुशी मनाने के इब्लीसी तरीक़े चुपचाप सिखा रहे हैं।
और आ जाये धोखे में सीधा-सादा उम्मती इसे सुनकर,
जो यह नारे पुरज़ोर लगा रहे है
सिवाए इब्लीस के जहां मे सभी तो खुशियां मना रहे हैं
निसार तेरी चहल-पहल पर हज़ारों ईद-ए-रबीउल अव्वल,
सिवाए इब्लीस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं।
और जैसे जाहिल मनाते हैं दिन कोई अपने किसी बड़े का,
वही जहालत हम ईद-मिलादुन्नबी में ला रहे हैं।
#zakiansaripoems #zakiansariquotes #bestpoem #eidmiladdunnabi #islam #muslim



.png)




