जब मर्द बिरयानी के बदले औरत के जिस्म की ललक रखे,
और डॉक्टर लाशों पर हँसना सीख जाएँ।
तो समझ लो फसल वही है, बीज हमने बोए थे।
₹370 की बिरयानी, और बदले में वसूली चाहिए
थोड़े से सिक्के, और औरत के जिस्म पर क़ब्ज़ा चाहिए
बाहर वाले ख़ुद को जैसे-तैसे बचा ही लेंगे
पर इस सोच के मर्द से उसी के घर की औरतों को डरना चाहिए
फरिश्ता समझते हैं उन्हें जिन्हें ज़मीं पर 'डॉक्टर' कहते हैं
कम से कम अपने पेशे की तो इज़्ज़त करनी चाहिए
मुर्दों के आज़ा देखकर हँसते हैं जो लाश पर
मिल जाए कहीं तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए
और कब तक उठाए फिरेंगे बोझ तमीज़ और तहज़ीब का ?
नए ज़माने में तो कुछ बदअख़्लाक़ी भी 'नई ' चाहिए
उरियानी सड़क पर, बेहयाई ज़बान मे, फाहशी सोच मे
क्या वाक़ई यही तरक़्क़ी है जिसे हमें अपनाना चाहिए?
हम ने खुद उड़ा दी मज़ाक मे वो बात, जो मज़ाक नहीं थी
केसी हो तरबियत बच्चो की हमें फिर से सोचना चाहिए
और जो फसल उग रही है, बस उसी का तो क़ुसूर नहीं है,
बीज किसने बोए थे, यह सवाल भी होना चाहिए।
कठघरे में सिर्फ़ गुनहगार नहीं, मुआशरा भी खड़ा है,
उजड़े गर बाग़ तो....
कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए।
हाँ, कुछ जवाबदेही माली की भी तो होनी चाहिए
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